Sunday, March 8, 2026

मन की हकीकत

न हमारा ईमान बचा, न ही पहचान बची,

बतलाएं भी तो बतलाएं, तुम्हें क्या सची,

उम्मीदों और यादों के सहारे, ऐ 'परचेत',

थोड़ी सी ख्वाहिशों की बस, जां बची।


3 comments:

यकीं

रात गहरी है मगर यकीं रख, मैं सोऊंगा नहीं। तू, जितना मर्जी मुझे रुलाने की कोशिश कर, मगर, मैं  तनिक भी रोऊंगा नहीं, बेदना बहुत है इस दिल में म...