मन की हकीकत

न हमारा ईमान बचा, न ही पहचान बची,

बतलाएं भी तो बतलाएं, तुम्हें क्या सची,

उम्मीदों और यादों के सहारे, ऐ 'परचेत',

थोड़ी सी ख्वाहिशों की बस, जां बची।


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