Sunday, March 8, 2026

मन की हकीकत

न हमारा ईमान बचा, न ही पहचान बची,

बतलाएं भी तो बतलाएं, तुम्हें क्या सची,

उम्मीदों और यादों के सहारे, ऐ 'परचेत',

थोड़ी सी ख्वाहिशों की बस, जां बची।


1 comment:

हकीकत

उजागर न होने दिया हमने  उजागर न करने के ऐब से, वाकिफ बहुत खूब थे हम, तुम्हारे छल और फरेब से।