Wednesday, March 4, 2026

हो ली,,,









पर्व रंगों का है वेरंगीन बन,

बैठा हूं बातें करता खुद से,

कभी न जाने क्यों ऐसा लगे,

हाथ धो बैठा हूं सुध-बुध से।

 

मदहोश-बेखबर, था तो नहीं,

दर्द का एहसास है बे-खुद से,

घाव जिस्म पे मेरे आहिस्ता कर,

अनुनय यही है बस, हुद-हुद से।



2 comments:

कुपत

तुम्हें पाने की चाह में मुद्दतों बैठे रहे हम, तुम्हारे बाप के पास, घंटों पैर दबाए मगर क्या मजाल कि  बुड्ढे को हुआ हो जरा भी एहसास।