हो ली,,,









पर्व रंगों का है वेरंगीन बन,

बैठा हूं बातें करता खुद से,

कभी न जाने क्यों ऐसा लगे,

हाथ धो बैठा हूं सुध-बुध से।

 

मदहोश-बेखबर, था तो नहीं,

दर्द का एहसास है बे-खुद से,

घाव जिस्म पे मेरे आहिस्ता कर,

अनुनय यही है बस, हुद-हुद से।



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