Monday, March 16, 2026

पुनर्विवरण !

रातों के हर पहर-दोपहर, 

जब भी  मैं करवट बदलूं,

बदली हुई हर करवट पर, 

कसम से आहें भरता हूं ,

उम्र पार कर चुका प्रेम की वरना,

 कह देता कि  मैं तुमपर मरता हूं ,

मत पूछो, ये नशा कौन सा करता हूं,

 सच में, मैं तुम्हें बतानें से डरता हूं।


4 comments:

  1. यार, ये लाइन्स दिल की हालत साफ दिखाती हैं। आपने बिना ज्यादा शब्दों के गहरी फीलिंग पकड़ ली है। मुझे यह बात बहुत असली लगी कि आप प्यार छुपाने की बात करते हो, क्योंकि कई बार लोग सच में ऐसा ही महसूस करते हैं। हर करवट पर याद आना और फिर भी खुलकर न कह पाना, यही तो असली कशमकश है।

    ReplyDelete

सलाह

तू खुद ही से इकबार रूबरू तो हो जा, फिर जो कहना है, उसे आलेख लेना, अरे वो, कश्ती के मुसाफिर, उतरने से पहले, एकबार समन्दर तो जाकर देख लेना।