संयोग

 ठुकरा गई थी वो जो हमको 

दौर-ए-जवानी कुछ तन्हाइयां,

उम्र के इस पड़ाव पर फिर से,

बेताब हैं हमें गले लगाने को 'परचेत'। 

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