पश्चाताप

अपने जो भी कहने को थे, सब अजनबी हुए,

और खामोशियां बन गई हमारी जीवन साथी,

क्या नहीं त्यागा था उनके लिए हमने 'परचेत',

हम-सफ़र तो थे किंतु, उनसे हम-नवाई ना थी।



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