Thursday, February 5, 2026

पश्चाताप

अपने जो भी कहने को थे, सब अजनबी हुए,

और खामोशियां बन गई हमारी जीवन साथी,

क्या नहीं त्यागा था उनके लिए हमने 'परचेत',

हम-सफ़र तो थे किंतु, उनसे हम-नवाई ना थी।



1 comment:

कुपत

तुम्हें पाने की चाह में मुद्दतों बैठे रहे हम, तुम्हारे बाप के पास, घंटों पैर दबाए मगर क्या मजाल कि  बुड्ढे को हुआ हो जरा भी एहसास।