Monday, February 2, 2026

स्वीकारोक्ति

हिम्मत ही नहीं रही जब,

दिखाने को कुछ नया करके,

फायदा ही क्या है 'परचेत',

तब अफसानें बयां करके।




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पुनर्विवरण !

रातों के हर पहर-दोपहर,  जब भी  मैं करवट बदलूं, बदली हुई हर करवट पर,  कसम से आहें भरता हूं , उम्र पार कर चुका प्रेम की वरना,  कह देता कि  मैं...