नादानी

पता नहीं किसको ढूंढते रहे थे हम, 

सबसे पूछा, डाकिया,धोबी,खलासी, 

सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े,

लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी, 

उम्र गुजरी,तबअहसास हुआ 'परचेत', 

जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी।

Comments

Popular posts from this blog

यूं भी बावफा होते है लोग !

धार्मिक भावनाएं क्या हुई, कोई छुई-मुई हो गई !

'नारी' की चिंता में दुबले कुछ ब्लॉगर मित्र !