इस जिंदगी का फलसफा बस, इतना सा रहा 'परचेत',
मुकाम पर हम खुद को लानत-मलामत हजार देते हैं,
संदेश उसतक पहूंचा देना, ऐ तख्त पर लटकाने वालों,
चलो, कुछ यूं करते हैं अब जिंदगी, तुझको गुज़ार देते हैं।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
उनको देखकर कुछ न भाया, सहज थे,असहज से भा गए, नूर चेहरे का तो तब छलका, महफ़िल में जब तुम आ गए।
सुंदर
ReplyDelete