अरे वो अधर्मी,
बड़ी ही अजब है तेरी ये बेशर्मी,
बड़ी ही अजब है तेरी ये बेशर्मी,
कड़क सर्दी में भी ताप रहा देश,
बलात्कार एवं भ्रष्टाचार की गर्मी।
अरे वो अधर्मी !
अरे वो अधर्मी !
ऐसा चल रहा है सुशासन तेरा,
सदय पे जुल्म, शठ पे नरमी,
डरा-डरा सा है हर वतन-परस्त,
जेड-प्लस तले घूम रहे कुकर्मी।
अरे वो अधर्मी !!
आम जनता का दर्द ...
ReplyDeleteहमारे देश में सिर्फ देशभक्तों को ही गिरफ्तार करने और फांसी पर लटकाने का रिवाज़ है! बलात्कारी खुले घुमते हैं यहाँ !
ReplyDeleteमर्ज बद्धता गया ज्यो-ज्यो दावा किया.
ReplyDeleteअच्छी प्रस्तुति के लिए धन्यवाद
सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति बधाई नारी महज एक शरीर नहीं
ReplyDeleteतंत्र जब भ्रष्ट-तंत्र लोक तंत्र परिवार तंत्र
ReplyDeleteदेश रसातल जायगा यही विदेशी मन्त्र ...
बढ़िया,
ReplyDeleteजारी रहिये,
बधाई !!
वतन- परस्त,
ReplyDeleteजेड-प्लस तले
घूम रहे कुकर्मी !
अरे वो अधर्मी !!
..सही तमाचा जड़ा गाल पर ..
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार 25/12/12 को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका स्वागत है ।
ReplyDeleteचिंताजनक समय है
ReplyDeleteशायद कभी अक्ल आये।
ReplyDeleteदेह में छिपी देवी । जहाँ नारी की पूजा - सम्मान होता है, देवता वहां वास करते है । कहने के लिए - चर्चा के लिए सरल परन्तु इसकी स्व-अनुभूति और फिर आचरण में यह विचार-वर्तन लाना कठिन है, और फिर भी इसकी आवश्यकता भारत और उसके कई प्रदेशो में इतनी गंभीर है - सोचना है हमें रुट कोज़ तक कैसे जाए और कौन कौन से आयाम - परिबलो पर आंकलन - नियंत्रण लाये । नहीं तो यह चित्र जितना बहार दीखता है - हम जानते है कितना भयावह है अन्दर से । ध्वनि और प्रकाश का अंधाधुंध बलात्कार और बेलगाम कंटेंट दृश्य श्राव्य सामान, कन्फ्युजाई रिस्पोंसिबल पीढिया, अपमानित और अवमूल्यित स्वतंत्रता, और इस सब में हम भी शामिल हो गए - अगर दृष्टांत 'चेरिटी बिगिन्स एट होम' के माध्यम से नहीं रखेंगे ..... देर तो वैसे काफी हो ही गयी है ... फिर भी जागे तभी प्रभात ।
ReplyDeleteदुखद है, वर्तमान, भविष्य को क्या जाने।
ReplyDeleteफांसी पर लटका देना चाहिए इन अधर्मियों को...
ReplyDeleteदुश्शासन धृतराष्ट्र! अफसोस! अफसोस!
ReplyDeleteआम जनता का दर्द ...अफसोस!
ReplyDeleteअरे ओ अधर्मी ।
ReplyDeleteअपराधियों को मिल रही है उन्ही की शरण
जिनसे न्याय की उम्मीद है हमें ।
हरेक के मन के आक्रोश को जबां दे दी आपने .
आपके शब्द सीधे दिल पर लगते हैं, कोई घुमा-फिराकर बात नहीं की गई। गुस्सा भी है, पीड़ा भी और भीतर दबा डर भी साफ दिखता है। सबसे ज्यादा चुभता है वह विरोधाभास, जहाँ आम आदमी सहमा है और गलत करने वाले बेखौफ हैं। यह सिर्फ कविता नहीं, आज के हालात का आईना लगती है।
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