...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
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क्षणभंगुर
उनको देखकर कुछ न भाया, सहज थे,असहज से भा गए, नूर चेहरे का तो तब छलका, महफ़िल में जब तुम आ गए।
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नोट: फिलहाल टिप्पणी सुविधा मौजूद है! मुझे किसी धर्म विशेष पर उंगली उठाने का शौक तो नहीं था, मगर क्या करे, इन्होने उकसा दिया और मजबूर कर द...
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ये दिल निसार करके जाना कि राहे जफा होते है लोग, सच में, हमें मालूम न था कि यूं भी बावफा होते है लोग ! सोचते थे कि नेमत है खुदा की य...
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तमाम जंगल के बीहड़ों में जो कुछ घटित हो रहा हो, उससे क्या उस जंगल का राजा अंविज्ञ रह सकता है? या फिर यूं कहा जाए कि यदि उसे उसके राज्य मे...

दिखा पिछाड़ी जो रहा, रविकर वही अमूर्त |
ReplyDeleteदो कौड़ी में बिक गया, लेता ग्राहक धूर्त |
लेता ग्राहक धूर्त, राष्ट्रवादी यह खोता |
खोता रोता रोज, यज्ञ आदिक नहिं होता |
खुली विदेशी शॉप, खींचता उनकी गाड़ी |
बनता लोमड़ जाय, अनाड़ी दिखा पिछाड़ी ||
कार्टून कुछ नहीं, बहुत कुछ बोलता है!
ReplyDeleteआजकल के अधिकाँश नेता (कुछ एक ), को छोड़कर मूर्खों की जमात के ही हैं ! सब कुछ बोलेंगे लेकिन मुद्दे पर स्थिर कभी नहीं रहते ! कब डंकी से हॉर्स पर स्विच कर ,जाते हैं पता ही नहीं लगता .
ReplyDeleteदमदार आर्थिक सोच यहीं से लागू की जा सकती है..
ReplyDeleteAnimals have been better-offs.
ReplyDeleteकमाल की प्रस्तुती
ReplyDeleteअसल् बात तो यह है की मेले में एक से एक बड़े गधे आये हैं तो वे बोलेंगे क्या |वे तो एक सुर में राग अलाप सकते हैं |
ReplyDeleteआशा