Friday, August 8, 2014

नादाँ !

थाम लो उम्मीद का दामन, छूट न जाए,
  रखो अरमाँ सहेजकर, कोई लूट न जाए।   
तुम्हारे ख़्वाबों से भी नाजुक है दिल मेरा,
  हैंडल विद एक्स्ट्रा केयर,कहीं टूट न जाए।

उलटबासी 
शायद ही बचा रह गया हो कोई धाम,
क्या मथुरा, क्या वृंदावन,क्या काशी,
किस-किस से नहीं पूछा पता उसका,
क्या धोबी,क्या डाकिया,क्या खलासी, 
 सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े, 
       लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,        
उम्र गुजरी,तब जाके ये अहसास हुआ,
जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी। 

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4 Comments:

Blogger कविता रावत said...

उम्र गुजरी,तब जाके ये अहसास हुआ,
जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी।
..बहुत बढ़िया ....पहले घर फिर बाहर

Friday, 08 August, 2014  
Blogger सु-मन (Suman Kapoor) said...

बहुत सुंदर ...रक्षाबंधन की शुभकामनायें

Saturday, 09 August, 2014  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

क्या बात सर ... हैंडल विथ एक्स्ट्रा केयर ...
रक्षाबंधन की बधाई ...

Sunday, 10 August, 2014  
Blogger प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' said...

बेहद उम्दा.. .बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
नयी पोस्ट@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ
रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनायें...

Sunday, 10 August, 2014  

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