Saturday, July 25, 2009

किसे जिम्मेदार ठहराएं ?

अपने बचाव और जनता की नजरों में धूल झोंकने के लिए सत्ता में बैठे हमारे इन कुटिल राजनीतिज्ञों ने अनेको उपाय ढूंढ निकाले है ! अगर कुछ हो जाए तो बस पुलिस जांच, सीबीआई जांच, न्यायिक जांच, ये आयोग, वो आयोग, ये अंकेक्षक, वो परीक्षक ! मगर अंत में नतीजा क्या, वही ढाक के तीन पात ! ये लोग बखूबी इस बात को समझते है कि हिन्दुस्तानियों की याददास्त बड़ी कमजोर है, उन्हें सुबह का खाया हुआ शाम को याद नहीं रहता, तो कई सालो बाद जब तक किसी आयोग की रिपोर्ट इनको मिलेगी और ये उसे सार्वजनिक करेंगे, तब तक तो हिन्दुस्तानी जनता उस घटना को भुला चुकी होंगी ! जो एक-आदा भूलेंगे नहीं, उन्हें रोजी रोटी और रोजमर्रा की मुसीबतों में ही इस तरह से उलझा के रखो कि वह लीक से परे हटकर और कोई बात सोच ही न पाए !

हाल में प्रकाशित अंकेक्षक और महालेखापरीक्षक, जो कि सरकारी खर्च का ऑडिट करता है, ने अपनी आडिट रिपोर्ट में सरकारी खर्च और रक्षा सौदों में गंभीर अनियमितताओ के जो आरोप लगाए है, उनकी सुनवाई कहाँ होगी और कौन करेगा ? महालेखापरीक्षक का मानना है कि जितने में (नौ हजार एक सौ करोड़ रूपये) हमारी सरकार रूस से पुराना विमान बाहक पोत खरीद रही है, उतनी कीमत में तो नया पोत आ जाता ! साथ ही १८७९८ करोड़ रूपये में जो फ्रांस की कंपनी से ६ पंडूब्बियाँ खरीदने का सौदा हुआ, वह भी किसी बड़े घोटाले की ओर इशारा करता है !

हम अगर तनिक अतीत में झाँककर देखे, तो हमने मिग श्रेणी के लडाकू विमानों की दुर्घटना में अपने अनेक होनहार युवा सैनिको को खोया है, और यह सिलसिला अब तक चला आ रहा है, ऐसा क्यों हुआ, सीधा सा जबाब है, हमारे नेताओ और लाल फीताशाही ने कमीशन और घूस खाने के चक्कर में निम्न किस्म के सैनिक उपकरण खरीदे, और खामियाजा भुगता सैनिक ने, आम जनता ने, और ये खरीददार अपना घर भरते रहे !

अब सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र के मायने सिर्फ यही रह गए है कि हम आमचुनाव का नाटक रचाकर, चंद उन लोगो को जो भ्रष्ट है, अयोग्य है और अक्षम है, उन्हें अपना और इस देश का भाग्य लिखने की आजादी दे, उसे लिखने के लिए इनके हाथों में कलम-दवात पकडा दे ? क्या ये इसी तरह निरंकुश होकर इस देश को लूटते रहेंगे, देश की गरीब जनता जो आज सरकार द्बारा उपलब्ध कराई जाने वाली हर सेवा, वस्तु अथवा उत्पादन पर अपने खून पसीने की गाडी कमाई से इनकी तिजोरी में टैक्स जमा कर रहा है, क्या ये उस पैसे को इसी तरह लुटाते रहेंगे? हमें किसी बाहरी दुश्मन की जरुरत है, जब हमने अपने यहाँ ही ये पाले हुए है ?

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3 Comments:

Blogger संगीता पुरी said...

सबकुछ झेलने को विवश हैं .. किसे जिम्‍मेदार ठहरा सकते हें हम ?

Saturday, 25 July, 2009  
Blogger Madhaw said...

सच के सवाल पर जवाब

सच के सवाल पर पिछले पोस्ट में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं मिली उससे तो यही ज़ाहिर होता है कि हम परिपक्व तो हैं… लेकिन दिखना नहीं चाहते... या उस परिपक्वता को कबूल करने से डरते हैं...

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Sunday, 26 July, 2009  
Blogger Madhaw said...



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Sunday, 26 July, 2009  

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