जब वो,
दर्द-ऐ-दिल अपना,
शब्दों मे न समेट पाया
तो कमबख़्त,
आंसू बनके
उसकी आँखों से छलक आया।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
अपनी हर परेशानी का सबब, मैं तेरे मूंह पे फेंक देता, गर ये कश्ती का मुसाफिर 'परचेत', समंदर देख लेता।
वाह.. क्या बात।
ReplyDeleteनई रचना
मार्मिक और हृदय स्पर्शी रचना।
ReplyDeleteहृदय स्पर्शी
ReplyDeleteमार्मिक रचना
ReplyDeleteजब वो,
ReplyDeleteदर्द-ऐ-दिल अपना,
शब्दों मे न समेट पाया
तो कमबख़्त,
आंसू बनके
उसकी आँखों से छलक आया।
बहुत ही सुन्दर लिखा है अपने ब्लॉग में आपने। इसके लिए आपका दिल से धन्यवाद। Visit Our Blog Zee Talwara