Friday, August 7, 2020

दोष

मालूम था हमको,वो बुरी चीज है,

जिसे पीती है दुनियांं बडे नाज से,

मगर, ऐ साकी, बर्बाद हम यूं हुए,

कुछ तेरे पिलाने भर के अन्दाज से।



5 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (09-08-2020) को     "भाँति-भाँति के रंग"  (चर्चा अंक-3788)     पर भी होगी। 
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
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  2. बहुत सुंदर

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  3. बहुत सुंदर

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  बेरुखी, खामोशी, यादों का बोझ, फेहरिस्त लम्बी है इस  तन्हाई की, अब क्या? उम्र कट गई 'परचेत' ,  राह तकते-तकते इक हरजाई की।