मालूम था हमको,वो बुरी चीज है,
जिसे पीती है दुनियांं बडे नाज से,
मगर, ऐ साकी, बर्बाद हम यूं हुए,
कुछ तेरे पिलाने भर के अन्दाज से।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
ना ही अभिमान करती, ना स्व:गुणगान गाती, ना ही कोई घोटाला करती, न हराम का खाती, स्वाभिमानी है, खुदगर्ज है, खुल्ले में न नहाती, इसीलिए हमारी भै...
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (09-08-2020) को "भाँति-भाँति के रंग" (चर्चा अंक-3788) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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:) बढ़िया है।
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteखूब।
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