मुझे चाहिए इक ऐसा खोता, जब मैं चांहू तब उसे जोता। ढेंचू-ढेंचू करता वो दौड़ा आये, जब दूं समीप आने का न्योता। मुझे चाहिए इक ऐसा खोता..... कूल रहे हमेशा, जहां तक हो, किसी बड़े स्कूल से स्नातक हो, बोल न बोले कोई दिल चुभो ता, मुझे चाहिए इक ऐसा खोता..... ऋतु मुताबिक गाना गाना जाने, हर व्यंजन,पकवान पकाना जाने, कभी भी ऐन वक्त पे मिले न सोता, मुझे चाहिए इक ऐसा खोता.....
वाह
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ReplyDeleteWahhh
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Deleteबहुत अच्छा
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Deleteये चार पंक्तियाँ बहुत चुपचाप दिल में उतर जाती हैं। तुमने ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं की, बस एक सादा-सा सवाल रख दिया। मुझे इसमें अधूरापन, इंतज़ार और थोड़ी थकान साफ़ दिखती है। ऐसा लगता है जैसे सामने सब कुछ था, फिर भी पकड़ में कुछ नहीं आया।
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