तुझको नम न मिला
और तू खिली नहीं,
ऐ जिन्दगी !
मुझसे रूबरू होकर भी
तू मिली नहीं।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
आज उन्होंने जैसे मुझे, पानी पी-पीकर के कोसा, इंसानियत से 'परचेत', अब उठ गया है भरोसा।
वाह
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ReplyDeleteWahhh
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Deleteबहुत अच्छा
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Deleteये चार पंक्तियाँ बहुत चुपचाप दिल में उतर जाती हैं। तुमने ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं की, बस एक सादा-सा सवाल रख दिया। मुझे इसमें अधूरापन, इंतज़ार और थोड़ी थकान साफ़ दिखती है। ऐसा लगता है जैसे सामने सब कुछ था, फिर भी पकड़ में कुछ नहीं आया।
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