हां, उलझनें हैं क्योंकि
बीच हमारे अनबन है,
दरमियां फासले हैं, मगर
मिलने का भी मन है।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
मंजूर तेरी हर ख्वाहिश, भले ही तू मेरे पास मत रहना, बस, इतनी सी आरज़ू है , अकेले तू उदास मत रहना।
ये चार पंक्तियाँ बहुत सच्ची और दिल के करीब लगती हैं। आप रिश्तों की उस हालत को पकड़ लेते हैं, जहाँ मन नाराज़ भी होता है और मिलने की चाह भी छोड़ता नहीं। अनबन, फासले और उलझनें सब होते हुए भी उम्मीद बची रहती है, यही बात इसे खास बनाती है।
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