मुझे चाहिए इक ऐसा खोता, जब मैं चांहू तब उसे जोता। ढेंचू-ढेंचू करता वो दौड़ा आये, जब दूं समीप आने का न्योता। मुझे चाहिए इक ऐसा खोता..... कूल रहे हमेशा, जहां तक हो, किसी बड़े स्कूल से स्नातक हो, बोल न बोले कोई दिल चुभो ता, मुझे चाहिए इक ऐसा खोता..... ऋतु मुताबिक गाना गाना जाने, हर व्यंजन,पकवान पकाना जाने, कभी भी ऐन वक्त पे मिले न सोता, मुझे चाहिए इक ऐसा खोता.....
ये चार पंक्तियाँ बहुत सच्ची और दिल के करीब लगती हैं। आप रिश्तों की उस हालत को पकड़ लेते हैं, जहाँ मन नाराज़ भी होता है और मिलने की चाह भी छोड़ता नहीं। अनबन, फासले और उलझनें सब होते हुए भी उम्मीद बची रहती है, यही बात इसे खास बनाती है।
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