संकल्प-२०२६

सलीके से न खुशहाली जी पाया, न फटेहाल में, 

बबाल-ए-दुनियांदारी फंसी रही,जी के जंजाल में, 

बहुत झेला है अब तक, खेल ये लुका-छिपी का,

मस्ती में जीयूंगा तुझे अब ऐ जिंदगी, नए साल में।

Comments

  1. यह पंक्तियाँ पढ़कर ऐसा लगा जैसे किसी दोस्त ने दिल खोलकर अपनी थकान और उम्मीद दोनों एक साथ रख दी हों। ज़िंदगी के झमेलों में उलझकर न पूरी खुशहाली जी पाए, न पूरी बेबसी, यह बात बहुत सच्ची लगी।

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