सलीके से न खुशहाली जी पाया, न फटेहाल में,
बबाल-ए-दुनियांदारी फंसी रही,जी के जंजाल में,
बहुत झेला है अब तक, खेल ये लुका-छिपी का,
मस्ती में जीयूंगा तुझे अब ऐ जिंदगी, नए साल में।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं कि जो फटते नहीं, फासले अगर बढ़ने लगें तो फिर घटते नहीं।
यह पंक्तियाँ पढ़कर ऐसा लगा जैसे किसी दोस्त ने दिल खोलकर अपनी थकान और उम्मीद दोनों एक साथ रख दी हों। ज़िंदगी के झमेलों में उलझकर न पूरी खुशहाली जी पाए, न पूरी बेबसी, यह बात बहुत सच्ची लगी।
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