Tuesday, December 30, 2025

संकल्प-२०२६

सलीके से न खुशहाली जी पाया, न फटेहाल में, 

बबाल-ए-दुनियांदारी फंसी रही,जी के जंजाल में, 

बहुत झेला है अब तक, खेल ये लुका-छिपी का,

मस्ती में जीयूंगा तुझे अब ऐ जिंदगी, नए साल में।

2 comments:

  1. यह पंक्तियाँ पढ़कर ऐसा लगा जैसे किसी दोस्त ने दिल खोलकर अपनी थकान और उम्मीद दोनों एक साथ रख दी हों। ज़िंदगी के झमेलों में उलझकर न पूरी खुशहाली जी पाए, न पूरी बेबसी, यह बात बहुत सच्ची लगी।

    ReplyDelete

वज़ह!

गर तुम न खरीददार  होते, यकीन मानिए,  टके-दो-टके में भला कौन बिकता? मुहब्बत बिकाऊ न है और न थी कभी, बस, निवेश गलत किया है तुमने, इसीलिए घर मे...