सुन, प्यार क्या है,
तेरी समझ में न आए तो,
अपने ही प्यारेलाल को काट खा,
किंतु, ऐ धोबी के कुत्ते!
औकात में रहना, ऐसा न हो,
न तू घर का रहे, न घाट का।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
पर्व लोहड़ी का था और हम आग देखते रहे, उद्यान राष्ट्रीय था और हम बाघ देखते रहे। ताक में बैठे शिकारी हिरन-बाज देखते रहे, हुई बात फसल कटाई की, ...
No comments:
Post a Comment