ये दिल निसार करके जाना कि राहे जफा होते है लोग, सच में, हमें मालूम न था कि यूं भी बावफा होते है लोग ! सोचते थे कि नेमत है खुदा की ये जज्बा , इल्म न था कि वफ़ा की कस्मे खाने वाले, इस कदर बेवफा होते है लोग ! दिल और आँख का ऐसा आपसी देखा जो समन्वय 'परचेत', नजर देखे, दिल शकूं पाए, मनीषी ऐसे ही नफ़ा होते है लोग !
वाह
ReplyDelete🙏🙏
ReplyDeleteWahhh
ReplyDelete🙏🙏
Deleteबहुत अच्छा
ReplyDelete🙏🙏
Deleteये चार पंक्तियाँ बहुत चुपचाप दिल में उतर जाती हैं। तुमने ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं की, बस एक सादा-सा सवाल रख दिया। मुझे इसमें अधूरापन, इंतज़ार और थोड़ी थकान साफ़ दिखती है। ऐसा लगता है जैसे सामने सब कुछ था, फिर भी पकड़ में कुछ नहीं आया।
ReplyDelete