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Saturday, August 29, 2020
एक लघु मगर जरूरी पोस्ट- अभी सोने का नहीं, लुडक जाओगे।
ज्यादा पुरानी बात नहीं है, आपको याद होगा शेयर बाजार जब इक्तालिस हजारी थे तो 55 हजारी की बात की जा रही थी और कर कौन रहे थे ? बाजारू गिद्ध। फिर क्या हुआ ? 41 हजारी 30 से भी कहीं नीचे आ लुडका। अब भला , दोष कोरोना का ही क्यों न रहा हो।
बस, इस संक्षिप्त पोस्ट के मार्फत आपको यही चेताना है कि वही स्थिति आज बुलियन मार्केट की है। दलाली गिद्धों ने तात्कालिक फायदे के लिए इसे चढाया हुआ है, बहुत आवश्यकता के अलावा इसमे न उल्झें।
नीचे दो चित्र चस्पा किए हैं उनसे स्थिति को समझने की कोशिश करें।
सरकारों की नासमझी और प्रशासन की अकर्मण्यता का खामियाजा भुगतने को मजबूर पहाड़ी।
01 अप्रैल 1973 को बंगाल टाइगर्स को बचाने की मुहिम के तहत तत्कालीन इंदिरा सरकार ने टाइगर प्रोजेक्ट शुरू किया था। मकसद यही था कि तेजी से लुप्त होती जा रही बंगाल टाइगर की आबादी को संरक्षित किया जाये, किंतु भ्रष्टाचार से ग्रसित सिस्टम के तहत कोई खास सफलता हासिल न हुई।
परिणाम स्वरूप, २००६ मे, जब श्रीमती सोनिया गांधी की सरकार सत्ता मे थी , टाइगर्स की की गई गिनती मे टाइगर्स की आवादी मात्र १४११ रह गई।
फिर शुरू हुआ सरकार, नौकरशाहों और तथाकथित पर्यावणविदों द्वारा अपनी अक्षम्यताऔं पर पर्दा डालने का सिलसिला। विभिन्न स्थानों से बाघ, तेंदुए इत्यादि मांसाहारी प्राणी एक वन से दूसरे वनों को स्थानांतरित किये गये और ऐसे ही बहुत से हिंसक प्राणी उत्तराखंड के जंगलों मे छोड दिए गये।
मगर, बुद्धि से पैदल ये ज्ञानी लोग यह भूल गये कि जिन मांसाहारी प्राणियों को वे उत्तराखंड के जंगलों मे छोड रहे हैं,उनके पोषण की इन्होंने क्या व्यवस्था की है। होना ये चाहिए था जिस वक्त एक निश्चित संख्या मे हिंसक जन्तुओं को उत्तराखंड के जंगलों मे छोडा गया था, उसके छह गुना तादाद मे अहिंसक जीवों जैसे पहाड़ी हिरन और अन्य पहाड़ी जीवों को भी इन वनों मे छोडा जाता ताकि ये हिसंक प्राणी अपने उपभोग का म़ांंस इन जीवों से प्राप्त कर सकें मगर बडा सवाल ये कि अपना घर भरने से फुर्सत किस सर
कारी महकमे को थी?
नतीजन, वनों मे जो भी अहिंसक प्राणी सीमित संख्या मे थे, वो सब हिंंसक प्राणियों का निवाला बन चुके और अब सारे हिंसक प्राणी जैसे, बाघ तेन्दुए गांवो की ओर रुख करने को मजबूर हो गये। यही कारण है कि जिस बाघ ने ११ अगस्त को श्रीनगर के समीप मलेथा गांव मे तीन बहनों मे से एक को अपना निवाला बनाया था, वही, सुप्त प्रसाशन का लाभ उठाते हुए.१५ अगस्त को मलेथा गाँव के ही एक स्कूल मे झंडारोहण को भी पहुंच गया और ग्राम प्रधान सहित कई को घायल कर गया।
ऐसा कुछ भी ख़ास है नहीं बताने को, अपने बारे में ! बस, यों समझ लीजिये कि गुमनामी के अंधेरो में ही आधी से अधिक उम्र गुजार दी !हाँ, अपनी बात कुछ भगत सिंह जी के अंदाज में इस तरह कहूंगा ;
इन बिगड़े दिमागों में, ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल ही रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।
साभार,
गोदियाल
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regards,
Godiyal
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