Friday, August 21, 2020

ऐ जिंदगी।

ऐ जिंदगी बता,
तूने क्यों ये गजल छेडी,
इन बदरंग सफो़ंं मे,
हम तो जिये ही जा रहे थे तुझको, 
हर पल हसींंन लम्हों मे,
दफाओं की दरकार तो सिर्फ़, 
शिकायतों को हुआ करती है,
हमने तो कभी सोचा ही नहीं, 
नुक्शानों मे जिए कि नफ़ोंं मे।

ऐ जिंदगी, मुझको अब इतना भी मत तराश कि 
बदन की दरारें, नींद मे खलल का सबब बन जांए।







6 Comments:

Blogger Onkar said...

बहुत सुन्दर

Sunday, 23 August, 2020  
Blogger Anuradha chauhan said...

बहुत सुंदर

Sunday, 23 August, 2020  
Blogger Ananta Sinha said...

आदरणीय सर ,
बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है यह। ह्रदय से आभार व सादर नमन।

Sunday, 23 August, 2020  
Blogger Sudha Devrani said...

ऐ जिंदगी, मुझको अब इतना भी मत तराश कि
बदन की दरारें, नींद मे खलल का सबब बन जांए।
वाह!!!

Sunday, 23 August, 2020  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

आभार, आप सभी का 🙏

Sunday, 23 August, 2020  
Blogger अनीता सैनी said...

वाह!लाजवाब सर।
ज़िंदगी फ़लसफ़ा ।
सादर

Monday, 24 August, 2020  

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