Sunday, August 2, 2026

अफसोस

 निष्पक्षता धसी दुराचार के दल-दल मे,

निडरता कुटिलता से डर गई, 

कागजों के बागी तेबर देखकर,

कलम जंतर-मंतर पर आत्महत्या कर गई।


दौर-ए-काॅकरोच, हया गुमशुदा हुई,

परतें शराफ़त की चेहरों से उतर गई, 

मोटी सी वो किताब जिसे 

बाबासाहेब ने लिखा था,

सुना है उसे, 

अपने ही घर की चुहिया कुतर गई।

2 Comments:

Blogger सुशील कुमार जोशी said...

लाजवाब

Sunday, 02 August, 2026  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

🙏🙏

Monday, 03 August, 2026  

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