Saturday, February 27, 2010

अरे, जब ५०-६० रूपये की भी औकात नहीं थी तो कार खरीदना क्या जरूरी था ?

आज सबेरे-सबेरे अपने पढ़ोसी मुत्तुस्वामी जी से एक बार फिर से मुकालात हो गई ! मदर डेयरी से दूध लेकर आ रहे थे ! अपने को सतारूढ़ दल का दांया अथवा बांया ( पता नहीं कौन सा, मुझे ठीक से नहीं मालूम ) हाथ समझते है! शक्ल से कुछ खीजे से प्रतीत आ रहे थे ! अपनी तो आदत है परत चढ़ते घाव को कुरेदना, अत: झठ से राम-राम ठोक दी ! थोबड़े को हल्का सा पिघलाते हुए, मेरे राम-राम का जबाब दिए बगैर बोले ;

ये हमारे लोग भी न,
च. चु... क्या बताऊ, कभी नहीं सुधरेंगे !

मैंने शांत होकर पूछा : क्या हुआ मुत्तुस्वामी जी, खीजे हुए क्यों हो इतने ?

वे बोले : अरे, गोदियाल जी , कल रात को ग्याराह बजे घर पहुंचा !

मैंने कहाँ : ट्रैफिक जाम की वजह से लेट पहुंचे होंगे, मैं भी देर से ही पहुंचा था! क्या करे, दिल्ली में ट्रैफिक ही इतना हो गया !
वे बोले : अरे ट्रैफिक को मारो गोली, ये तो अपने देश के इन महान नागरिकों की वजह से जाम लगा था कल.....
क्यों कल ऐसा क्या था?
मैंने बीच में उनकी बात काटते हुए पूछा !

वे बोले : अरे भाई तुम भी न, साहित्यकार बनने के चक्कर में मुझे लगता है कि तुम्हे रास्ते में ड्राइव करते हुए भी ब्लोगबाणी और चिठ्ठाजगत ही नजर आता रहता है! अरे देखा नही पेट्रोल पम्पो पर कितनी भीड़ थी, दो रूपये साठ पैसे बचाने के चक्कर में....... जब पैट्रोल पम्प पर जगह नहीं मिली तो सड़क में ही लाइन लगा दी कारों की! सचमुच बड़े "घोंचू" टाईप के लोग है, २०-२२ लीटर पहले से आधा भरी गाडी की इंधन की टंकियों में भरवाकर कितना बचा लिया होगा ? ज्यादा से ज्यादा ५०-६० रूपये, बस !

अरे जब पचास-साठ रूपये की भी औकात नहीं थी तो गाडी खरीदना क्या जरूरी था? ऊपर से दूसरे लोगो का २-३ लीटर पैट्रोल और वक्त जाम की वजह से जाया करवा दिया, वो अलग.........! तरस आता है, ऐंसे लोगो पर..... ( नौन-स्टॉप बोले ही जा रहे थे)

बात काटते हुए मैं बोल पडा; अच्छा स्वामीजी, आपके बजट के बारे में क्या राय है, आम लोग तो बड़े दुखी है इस बजट से.....

वे बोले; अरे भाई गोदियाल साहब , आम लोगो का काम ही दुखी होना है, अगर ये दुखी नहीं हुए तो ये आम लोग किस बात के ? अब देखिये न बजट को भी तो प्रणव दा ने आम बजट ही बताया ! यानी कि आम की तरह का बजट...
आम की तरह का बजट?
मैं कुछ समझा नहीं स्वामी जी, मैंने कहा!

वे बोले; अरे भाई, आम तो देखा ही होगा... उसको चूसो तो क्या मीठा-मीठा रस निकलता है, मगर चूसने वाला हकीकत से तब वाकिफ होता है, जब अन्दर एक मोटी गुठली मिले! बस वैसे ही समझ लीजिये, अपने प्रणव दा के बजट को भी ..ये अपने देश के घोंचू हैं न, इन्हें इसी तरह की चीजे सूट भी करती है इसीलिए तो अपनी पार्टी हमेशा अब्बल रहती है, क्योंकि वे इन घोंचुओ की आदते खूब भली प्रकार से जानते है !

मैं कुछ समझा नहीं, मैंने फिर कहा !

वे बोले; ज्यादा भोले भी मत बनो, अरे भाई इसमें समझने की क्या बात है, साधारण सी बात है, हमारी पार्टी के लोगो का मानना है और वे अंग्रेजो से मिली इतनी लम्बी शिक्षा-दीक्षा में यही तो सीखे है कि इन घोंचुओ को रोटी-दाल की चिंता में ही उलझाये रखो, अगर जिस दिन इन्हें भर भेट मिलना शुरू हो गया तो समझो ये झंडा कंधे पर रख हो-हल्ला मचाना शुरू कर देंगे........

मुत्तु स्वामी जी, आप ये बार-बार घोंचू शब्द का संबोधन क्यों कर रहे है ? मैंने टोकते हुए कहा !

वे बोले; अरे भाई, इसकी भी एक दिलचस्प कहानी है! आप तो जानते ही है कि हमारे देश में दो (अ)लोकप्रिय शब्द जिनका शुरुआती अक्षर "घ" व "चू" है, अंग्रेज अफसर अक्सर अपने गुलामों को तब " हो मैंन, तुम स्साला "घ" व "चू" हमारा काम ठीक से नहीं करटा...." कहकर संबोधित करते थे! अत हम लोगो ने उस 'घ' व"चू" को बाद में बिगाड़ कर " घोंचू" कर दिया ! बस , तभी से घोंचू शब्द फेमस हो गया! इसलिए प्रणव दा ने भी इन्हें दाल-रोटी के चक्कर में ही उलझाए रहने दिया ! आम आदमी जो घर नहीं खरीद सकता, किराए पर रहता है! किराए पर १०% सर्विस टैक्स लगा दिया ! तुम क्या सोचते हो मकान मालिक टैक्स अपनी जेब से पे करेगा ? नहीं इसी आम आदमी से वसूलेगा न ! तो उलझा दिया न मकान- मालिक और किरायेदार को, लड़ते रहो , हमें तो टैक्स चाहिए !
मगर मुत्तुस्वामी जी, सरकार ने वेतन भोगियों को टैक्स में इतनी छूट भी तो दी है !

मुत्तुस्वामी जी एक फूहड़ सी (अ)संसदीय हंसी हसने के बाद बोले ; यही तो हमें अंग्रेजो से सीख मिली कि मारो तो ऐसा मारो कि पानी भी न मांगे और उसे पता भी न चले कि किसने मारा ! आपको तो याद होगा न कि पिछले ही साल सरकार ने घोषणा की थी कि अगले साल से दस लाख तक की इनकम टैक्स फ्री हो जायेगी ! उसे हमारे प्रणव दा ने सफाई से अगले साल तक के लिए टाल दिया और पांच लाख तक सिर्फ १०% टैक्स का झुनझुना पकड़ा दिया, घोंचू भी खुश और सरकार का मकसद भी पूरा ! यही तो हमारी वो इस्टाइल है जिसके आधार पर इन घोंचुओ ने सब कुछ जानते हुए भी दोबारा सत्ता में बिठाया! इसे कहते है मैनेजमेंट , अब थोड़ा बहुत लौलीपोप इनको अगले चुनाव से पहले पकड़ा देंगे, फिर खुश हो जायेंगे ! भई, तभी तो हम कहते है कि हम सब को साथ लेकर चलने वाली पार्टी है! हा-हा-हा ( फिर वही (अ)संसदीय हंसी हंसकर मुत्तुस्वामी जी ऐसे निकल लिए, मानो संसंद में प्रधानमंत्री मनमोहन जी, प्रणव दा की पीठ थपथपाकर निकल लिए हो !

Friday, February 26, 2010

नफरत बसाने से फायदा क्या !

दर्द जुबाँ पे आने दो  
दबाने से फायदा क्या ,
अश्रुओ को छलक जाने दो 

छुपाने से फायदा क्या।  

खिला फूल किसे नहीं भाता
मुरझाने  से फायदा क्या ,
रख पाओ तो  खिला चेहरा  
सुजाने  से फायदा क्या।  

ज़िन्दगी को  नजदीकियां मिलें ,,
दूरियां बढ़ाने से फायदा क्या,

सुर ही भटक जाएँ रियाज में,
तो नज्म सुनाने से फायदा क्या।

भला है हाथ बटाना किसी संग
टांग अड़ाने से फायदा क्या ,
प्यार समायोजन की  गुंजाइश हो,
तो
नफरत बसाने से फायदा क्या। 

Thursday, February 25, 2010

सचिन निसंदेह एक सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी है मगर....

सर्वप्रथम सचिन को इस उपलब्धि के लिए मेरी तरफ से हार्दिक बधाई ! निश्चित तौर पर उनकी इस उपलब्धि से क्रीडा के क्षेत्र में देश गौरवान्वित हुआ है । मगर एक बात अपने देश के मीडिया और उन क्रिकेटान्ध से कहना चाहूँगा कि सचिन भगवान् नहीं है भाई ! कल शाम को मैं अपने टीवी सेट पर खबरे सुनने बैठा, सचिन भगवान् है.... सचिन ये है... सचिन वो है.... उफ़, इन खबरिया चैनलों की बकवास सुनकर मुझे मजबूरन कुछ देर बाद सी एन एन का सहारा लेना पडा, अगर मैं बहुत अमीर होता तो शायद कल हाथ में पकडे रिमोट को स्क्रीन पर मारकर टीवी सेट को भी तोड़ देता। हद होती है किसी भी चीज की । आज एक ब्लोगर सज्जन का सुबह-सुबह लेख पढ़ा शहीदों का सम्मान तो दिल को बड़ा दुःख हुआ कि जिनकी कुर्बानियों की वजह से ये मीडिया और क्रिकेटान्ध खूब मनोरंजन और पैसे कमा / बटोर रहे है, उनकी सहादत की खबर देने और सुनने की इनके पास फुरसत नहीं।

ये हमारे कुछ क्रिकेटान्ध भले ही यह सुनना पसंद न करे, लेकिन अपनी तो भाई खरी-खरी कहने की ही आदत है ;
१. सचिन निश्चित तौर पर बस एक श्रेष्ठ क्रिकेटर है, और कुछ नहीं।

२.सचिन ने यह रिकॉर्ड अपने नाम ३७वे साल में खेलते हुए बनाया, जबकि जिम्बाब्वे के चार्ल्स कोवेंट्री ने २५वे साल में २००९ में बांग्लादेश के खिलाफ सईद अनवर की बराबरी की थी और पाकिस्तान के सईद अनवर ने १९९७ में चेन्नई में २८ साल की उम्र में (१९४ रन ) बनाया था।

३.ये मत भूलिए कि १२० करोड़ की आवादी वाले देश में किसी और योग्य खिलाड़ी का हक़ मारकर आप किसी एक को ४०-४५ साल तक खिलाते ही रहोगे तो वह कुछ तो रिकॉर्ड बनाएगा ही। जबकि दुसरे देशो के खिलाड़ी ३०-३२ की उम्र में रिटायरमेंट ले लेते है।

४. इस क्रिकेट के खेल ने इस देश के अन्य सभी खेलो को निगल लिया है! यही वजह थी कि अभी हाल में हॉकी के खिलाड़ियों को वह सब करना पडा जो वे भी नहीं चाहते थे। ओलंपिक चैम्पियन बिंद्रा का किस्सा अभी ताजा-ताजा ही है, अगर देश के सम्मान की इतनी ही चिंता करते तो अभी सितबर में होने वाले कॉमनवेल्थ खेलो में देश के लिए ढेर सारे मेडल दिलवाने की बात सोचते ।

इसलिए मेरे भाइयों, सचिन को इंसान ही रहने दो उसे भगवान् मत बनाओ ! बाहरी लोग तभी तो हमें दोगला कहते है क्योंकि एक तरफ हम अपने प्राचीन भगवानों ( श्री कृष्ण, श्री राम इत्यादि) को तो सेक्युलरिज्म की दुहाई देकर नहीं मानते और दूसरी तरफ वही सेक्युलर एक जीते जागते इंसान को भगवान् मान रहे है।

Tuesday, February 23, 2010

होली पर एक धमकी भरी गजल !

हिम्मत बा तोहरा में त अबकी तू,
गुजर कर देख हमार गली से,
नाम हमरा मुंती ना गर,
मरवा न देत तोहरा के कौनो नक्सली से!

डराय करत रहनी जो कबो तोरा से,
समझिएगा न हमका वो मुंती,
खूब चलत है अब आपन,
पूरा आदिवासी विरादरी हमरी है सुनती !

गुलाल डालकर छेड़ना तो दूर,
अब के सूरत देख ले हमार भली से,
नाम हमरा मुंती ना गर,
मरवा न देत तोहरा के कौनो नक्सली से!

तू अब इ न समझि ,
बन्दूक चलावे के सिर्फ तोहरे के आवत बा,
ए.के. सैंतालीस चलावेके,
अपने किशनजी हमरो के सिखावत बा!

खूबे बर्जिस हम हूँ करत बानि,
पहलवान कम नाही कौनो खली से,
हिम्मत बा तोहरा में त अबकी तू,
गुजर कर देख हमार गली से !

नाम हमरा मुंती ना गर,
मरवा न देत तोहरा के कौनो नक्सली से!!


भोजपुरी नाम-मात्र की जानता हूँ, अत: भाषाई त्रुटियों के लिए अग्रिम क्षमा !

Monday, February 22, 2010

महंगाई के लिए जिम्मेदार असल छोटे-छोटे मुद्दे, जिन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है!


फिर से एक बार संसद में सरकार द्वारा बढ़ती महंगाई का ठीकरा विश्वव्यापी मंदी के सिर फोड़ दिया गया ! लेकिन इसकी जड़ो तक जाने की या तो किसी के पास फुर्सत नहीं, या यों कहे कि कोई इस ओर ध्यान देना ही नहीं चाहता ! मेरी समझ से आज की इस महंगाई के जो दो मुख्य कारण है वे हैं ; एक तेजी से फैलते कंक्रीट के जंगल , और दूसरा उस पर पसरता वाहनों का मकडजाल !

खुद सरकार की पर्यावरण और वनों से सम्बंधित संसदीय समिति ने अपनी ३०वी रिपोर्ट में कहा था कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का ५० % यानी ३२० मिलियन हेक्टियर वन तथा कृषि योग्य हरित भूमि तथाकथित विकास की भेंट चढ़ गया! आंकड़े बताते है कि अकेले १९५१ से १९८० के बीच ६० हजार हेक्टियर भूमि सिर्फ सडको और विधुत ट्रांसमिशन लाइन बिछाने में ही प्रयुक्त हो गई साथ ही इसी दौरान १३४ हजार हेक्टियर भूमि आवास के लिए इस्तेमाल कर ली गई ! ये तो महज १९८० तक के आंकड़े थे ! अभी हाल के आंकड़ो पर गौर करे तो सिर्फ पिछले दस वर्षो में कुल कृषि योग्य भूमि का ३०% जनता और बिल्डरों ने आवास और टाउनशिप बनाने में नष्ट कर दी है! आप हर हफ्ते के अखबार उठा लीजिये, रोज कोई न कोई बिल्डर कहीं न कही टाउनशिप का विज्ञापन निकाल भूमि पूजन कर रहा है! और टाउनशिप में एक फ़्लैट की कीमत इतनी है कि एक आम मध्यमवर्गीय परिवार भी उसमे रहने के ख्वाब नहीं देख सकता, गरीब के रहने की बात तो दूर ! फिर सरकार किसके लिए खुले मन से इस कृषी योग्य भूमि को इस तरह लुटा रही है? क्या इससे कृषि उत्पादन कम नहीं होगा और क्या कृषी उत्पादन कम होने से कीमतों पर फर्क नहीं पडेगा ?

दूसरी तरफ हमारा माननीय सुप्रीम कोर्ट बड़े सक्रीय ढंग से सडको पर भारी वाहन पर नकेल कसने के लिए तो आगे आ गया, मगर कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि कम से कम भारी वाहनों के निर्वाध आवागमन के लिए सड़क पर एक अलग लेन तो हो, जिसपर किसी छोटा वाहन का चलना गैर-कानूनी माना जाए! आम जनता इन्ही भारी वाहनों में सफ़र करती है, अर्थव्यवस्था उअर कीमते इन्ही भारी वाहनों पर निर्भर है! लेकिन आम जनता की सोचता कौन है? सिर्फ जज साहब की कार कहीं जाम में नहीं फंसनी चाहिए, बस ! हर राज्य के बौडरो और चुंगियों पर अफसरशाहो की मनमानी के कारण हजारो ट्रक और मालवाहक वाहन घंटो खड़े रहते है! क्या इससे लागतों पर फर्क नहीं पड़ता ? रोज कोई न कोई कार और दुपहिया वाहन निर्माता नए-नए मॉडल बाजारों में उतार रहा है! पर किसी ने सोचा कि वे चलेंगे किस सड़क पर? सड़के तो पहले से वाहनों से पटी पडी है! जब ये वाहन भी जाम लगायेंगे तो इससे तेल की खपत नहीं बढ़ेगी क्या और उससे लागतों पर फर्क नहीं पडेगा क्या ? मकान और कार भले ही हर परिवार की ख्वाइश हो, मगर उसके लिए आधारभूत सुविधाए भी तो होनी चाहिए !

अभी भी वक्त है, मेरा मानना है कि अभी भी वक्त है अगर सरकार इन कुछ उपायों को तुरंत लागू करे तो महंगाई की आधी समस्या चुटकियों में ख़त्म हो जायेगी ;
१. अगले दस बर्षो के लिए कृषी योग्य भूमि पर किसी भी निर्माण पर तुरंत रोक , कोई नया टाउनशिप प्रोजक्ट न लगे ! रहने के लिए प्रयाप्त घर देश में मौजूद है , अभी क्या जनता खुले मैदानों में सो रही है ? और जो सो रही है उसे क्या ये महंगी टाउनशिप छत दे देंगे ?
२. बैंको तथा संस्थाओं से निजी वाहन खरीदने के लिए लोंन देने पर तत्काल प्रतिबन्ध ! यदि किसी को खरीदना ही है तो अपनी कमाई में से खरीदे, लोंन लेकर नहीं! दिखावे और देखा-देखी की इस दुनिया में लोगो के गर में तो खाने को आता नहीं है और बाहर लों लेकर कार खडी कर रहे है!
३. दो से अधिक बच्चे पैदा करने पर प्रतिबन्ध, इसके लिए तीसरा बच्चा होने पर, दंड के तौर पर उस परिवार से मोटा शुल्क वसूलने की व्यवस्था होनी चाहिए !
४. सरकार की फिजूल खर्ची और भ्रष्ठाचार पर कारगर रोक,उत्तर प्रदेश में डेड करोड़ तो मंत्रियों ने एक साल में चाय-पानी पर ही खर्च कर दिए! दिल्ली में कॉमन वेल्थ खेलो से सम्बंधित बजट निरंतर बढ़ रहा है जिसके लिए सरकार में भ्रष्टाचार मुख्य कारण है! अभी पैसा लुटा दिया, वसूलेंगे किससे ? जनता से टैक्स लगा कर , परिणामत: महंगाई बढ़ेगी!
५.देश की औद्योगिक इकाईया निरंतर बंद होती जा रही है, बिजली की समस्या इत्यादि की वजह से! बाजार चीनी माल से पटे पड़े है, जो एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था के लिए घातक है! अगर देशी मिलों और कारखानों को सरकारी प्रोत्साहन दिया जाएगा तो देश के उत्पादन के साथ साथ रोजगार भी बढेगा!
तो अभी भी वक्त है इन कुछ उपायों को तुरंत अमल में लाने के लिए !

नजारा !


बालकनी अथवा 
घर की खिडकी से 
बाहर गली में झांकना ,
यानि  कि  

दो सम्भाव्यताओं का  उदय।
या तो चक्षुओं को

सकून अथवा पीड़ा का अनुभव ,
या फिर कानों को कटु-मीठी श्रुति प्राप्ति ॥

पड़ोस के मकान की छत पर,
कोई चांद टहलता  सा दिखे ,
तो चक्षुओं को  सकूँ  मिलना  निश्चित। 

और यदि  नीचे गली में 
खम्बे की ओंट मे  खड़ा
कोई चकोर  भी नजर आये
तो  मधुर कर्ण-श्रुति  प्राप्ति  संभव ॥

किन्तु, यदि अचानक,
उस खुशनुमा वातावरण  को 

प्रदूषित करने हेतु
अमावस्या  छत पर आ जाये ।
चकोर फुदककर भाग खड़ा हो ,
चांद दुबककर कहीं छुप जाए
तो  कानो को कटु श्रुति 

और चक्षुओं को पीड़ा का अनुभव होना  अपरिहार्य ॥

Sunday, February 21, 2010

नया एकीकृत पाठ्यक्रम-कुछ सवाल !

मानव संसाधन विकास मन्त्री श्री कपिल सिब्बल के देश मे शैक्षणिक सुधारों के प्रति उठाये जा रहे कुछ कदम भले ही स्वागत योग्य हों, जोकि निश्चित तौर पर हमारी सरकारों को बहुत पहले और न सिर्फ़ कुछ गिने-चुने विषयों मे बल्कि पूरे पाठ्यक्रम के सम्बंध मे उठा लिये जाने चाहिये थे। खैर, देर आये दुरस्त आये, लेकिन मुझे इस मुहावरे को हज्म कर पाने मे कुछ दिक्कत मह्सूस हो रही है। मुझे लग रहा है कि अब बहुत देर हो चुकी, और कहीं यह नया प्रयोग लार्ड मैकाले की सदियों से सुप्त पडी आत्मा को इस देश मे एक बार फिर से अपना कुटिल खेल खेलने का अवसर न दे दे। दूसरी तरफ़ सरकार के इस कदम से अमेरिका समेत कुछ यूरोपीय देश यह आश लगाये बैठे है, और जैसा कि ओबामा प्रशासन मे दक्षिण और मध्य एशिया मामलों के सहायक मन्त्री रौबर्ट ब्लैक ने कहा है कि श्री कपिल सिब्बल ने उनसे वादा किया है कि सरकार संसद मे एक ऐसा विधेयक लायेगी जो भारत मे शिक्षा क्षेत्र खासकर उच्च शिक्षा मे विदेशी भागीदारी को बढायेगा।

जैसा कि विदित है कि देश भर के राज्य शिक्षा बोर्डो ने इस बात पर अपनी सहमति दे दी है, और जैसे कि स्कूल शिक्षा बोर्ड परिषद (COBSE) ने निर्णय लिया है कि सन २०११-१२ से समूचे देश मे विधार्थियों को हायर सेकेन्ड्री स्तर पर गणित और विज्ञान(भौंतिकी, रसायन, और जीव विज्ञान) का एक जैसा पाठ्यक्र्म पढना होगा। साथ ही स्कूल बोर्डो की परिषदें इस बात पर भी सहमत हैं कि उच्च शिक्षा और प्रोफेशनल कोर्सों के लिये भी २०१३ से एक आम प्रवेश परीक्षा ली जायेगी, जिसमे इन्जीनियरिंग और दवा के कोर्स भी शामिल है।

अब मुख्य विषय पर आता हूं । जैसा कि आप सभी जानते होंगे कि हमारे देश के कुछ राज्यों मे न सिर्फ़ दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों, बल्कि शहरों मे भी विधार्थियों को सभी पाठ्यक्रम हिन्दी और प्रान्तीय भाषाओं मे पढाये जाते है। अंग्रेजी एक सुनियोजित नीति के तहत नाम मात्र के लिये छटी कक्षा से पढाई जाती है। परिणाम स्वरूप विधार्थी आगे चलकर अनेकों दिक्कतों का सामना करता है। गणित और विज्ञान की कुछ अंग्रेजी शब्दावलियां ऐसीं है कि हम लाख सरल भाषा मे उसे हिन्दी और अन्य भाषाओं मे रुपान्तरित कर ले, लेकिन उसका मौलिक अर्थ सिर्फ़ अंग्रेजी का शब्द ही समझा पाता है। हम दूसरों की तसल्ली के लिये प्रवेश परिक्षाओं और पाठ्यक्रमों को हिन्दी मे चलाने का ढिढोरा पीटें, मगर सत्यता यही है कि इसके परिणाम स्वरूप आगे चलकर व्याव्हारिक जीवन मे वह विधार्थी प्रतिस्पर्धा मे टिक नही पाता। इंजीनियरिंग और स्वास्थ्य क्षेत्र को ही ले लीजिये, जब व्यावहारिक जीवन मे पल-पल सामना अंग्रेजी भाषा का ही करना है तो फिर वह हिन्दी किस काम की ? और यही वजह है कि कुछ राज्यों मे एक विधार्थी खुद की और माता-पिता की हार्दिक इच्छा के बावजूद भी मजबूरन नवीं अथवा ग्यारह्वीं कक्षा मे प्रवेश के वक्त गणित और विज्ञान विषय का त्याग कर देता है ।

अब इसका एक और पहलू देखिये। अन्य राज्यों का तो मुझे पता नही लेकिन जहां तक दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार का सवाल है, यहां पर पुस्तकों मे जो पाठ्यक्रम है, या युं कहें कि अभी जितना जटिल पाठ्यक्रम गणित और विज्ञान का इन राज्यों की पुस्तकों मे है, उतना सी बी एस ई की पुस्तकों मे नही है । पहले था, लेकिन बाद मे एक सोची समझी चाल के तहत इसे निम्न कोटि का बना दिया गया ! गणित के जो सवाल उपरोक्त राज्यों मे एक विधार्थी दसवीं मे पढ लेता है, उस तरह के सवाल सी. बी. एस. ई मे एक विधार्थी ग्यारह्वीं और और बारह्वीं कक्षा मे पढ्ता है। परिणामत: सी बी एस ई मे अध्ययनरत विधार्थी को वे प्रश्न अपने पाठ्यक्रम मे नही मिल पाते जिनके आधार पर उसे आगे चलकर आई.आई.टी. और अन्य प्रतियोगिता परिक्षाओं का सामना करना पड्ता है। नतीजन उसे मजबूरन कोचिंग का सहारा लेना पड्ता है। अत: इस बिन्दु से देखने पर तो यही लगता है कि समान पाठ्यक्रम लाने का फैसला उचित है, लेकिन फिर सवाल वही है कि इसे समान बनाने भर से क्या समस्या हल हो जायेगी ? क्या हिन्दी माध्यम से पढा विधयार्थी तीक्ष्ण बुद्दी का होने के बावजूद भी व्यावहारिक जीवन मे अंग्रेजी माध्यम से पढे विधार्थी का मुकाबला कर पायेगा ? या फिर दूसरी तरफ़ सिर्फ़ हायर सेकेन्ड्री स्तर पर बिहार, उत्तर प्रदेश जैसा पाठ्यक्रम पुस्तकों मे डाल भर लेने से सी बी एस् ई माध्यम का विधार्थी अचानक बढा दिये गये इस भार को झेल पाने मे समर्थ होगा ? या फिर पुस्तकों मे पाठ्यक्रम को इस स्तर का बना दिया जायेगा कि दोनो ही किस्म का बिधार्थी कहीं का भी न रहे ? वैसे ही पिछ्ले कुछ द्शकों मे हर लिहाज से शिक्षा का स्तर बहुत गिर चुका है।

क्या ही अच्छा होता कि बजाये इस तरह की हडबडी दिखाने और शिक्षा मे परिवर्तन लाने के श्रेय की होड से हट कर हम एक सुनियोजित और दीर्घकालिक निति के तहत निचले स्तर से ही पूरे देश मे शिक्षा प्रणाली को सुधारते, ताकि देश के किसी भी कोने मे स्थित किसी भी विधार्थी को आगे चलकर इन सब मुसीबतों का सामना न करना पडता । उम्मीद की जानी चाहिये कि शिक्षा सुधार की दिशा मे सरकारों द्वारा किये जा रहे प्रयास ईमान्दारी से और सोच-समझकर उठाये जायेंगे, न कि सिर्फ़ कुछ विदेशी शिक्षा संस्थाओ को देश मे डिग्री बेचने हेतु अपनी दुकानें चलाने तक सीमित रहेगा ! क्योंकि इसमे न सिर्फ़ एक विधार्थी का भविष्य बल्कि देश का भविष्य भी निहित है।


Saturday, February 20, 2010

वाह जी खुशवंत सिंह जी !

अभी कुछ देर पहले दैनिक हिंदुस्तान के गेस्ट कॉलम में जाने-माने और वयोवृद्ध लेखक श्री खुशवंत सिंह जी का एक आलेख पढ़ रहा था ! शीर्षक था "कितने अलग हैं राहुल और वरुण" यह तो काफी पहले से जानता था कि खुशवंत सिंह जी का एक ख़ास झुकाव नेहरू परिवार और कौंग्रेस के प्रति हमेशा से रहा है, और जो उनके लेखो में कई बार साफ़ परिलक्षित भी होता है! लेकिन मेरा हमेशा यह मानना है कि एक लेखक और साहित्यकार ज्यों-ज्यों वृद्ध होता चला जाता है, उसकी बौद्धिक क्षमता में निखार आता चला जता है! उसकी तर्क शक्ति निष्पक्ष होती चली जाती है! परन्तु आज उनका जब यह लेख पढ़ा तो न जाने मैंने क्यों अपने इस आत्मविश्वाश को डगमगाते पाया ! समझ नहीं पाया कि खुशवंत सिंह जी जैसे प्रसिद्ध लेखक ऐसे कैसे सोच सकते है? आइये, उनके उस लेख की एक हल्की सी झलक आप भी देख लीजिये, और खुद निर्णय कीजिये कि इस बात को नजरअंदाज कर कि इस देश ने यहाँ के सर्वोच्च पद पर एक सिख राष्ट्रपति और एक सिख प्रधानमत्री बिठाया था / है, मेनका जी के माध्यम से सिखों के प्रति इस देश के लोगो की सोच के बारे में उन्होंने जो कहा,क्या वह सत्य है? चूँकि खुशवंत सिंह जी एक जाने-माने " सेक्युलर" किस्म के लेखक है,इसलिए हमारे "सेक्युलर पाठको" को इसमें कोई खोट नजर न आये,मगर क्या यह एक ख़ास सम्प्रदाय के मन में कडुवाहट या विद्वेष पैदा नहीं करता ?

"........ फिलहाल तो मैं केंद्र के विकल्पों को लेकर परेशान हूं। सोनिया गांधी और मेनका को ‘बाहरी’ माना जाता है। सोनिया को इसलिए कि वह इतालवी कैथोलिक हैं। और सिख होने की वजह से मेनका। सोनिया ने तो खुद को हिंदुस्तानियों से ज्यादा हिंदुस्तानी साबित कर दिया..................."

Friday, February 19, 2010

देशी !


हीथ्रो हवाई अड्डे से प्रस्थान के वक्त भी उन दोनों बाप-बेटी को एयर पोर्ट तक ड्रॉप करने आई माँ ने एक पर फिर से रश्मि को, जिसे माँ-बाप प्यार से 'रिश' कहकर पुकारते थे, हिदायत भरे लहजे में समझाया था कि बेटा रिश, लौटते में वहां से फालतू का कूडा-कचडा मत उठा लाना। पर्यटन स्थलों पर वहाँ लोग "देशी माल" पर विलायती लेबल लगाकर पर्यटकों को मूर्ख बनाते है। अगर कोई चीज बहुत पसंद आ भी रही हो तो लेते वक्त दूकानदार जो दाम बताये, उससे ठीक आधे पर भाव तय करना। रश्मि को तो बस दादा-दादी के देश पहुचने की हडबडी थी, अत: वह माँ की बात को बहुत महत्व न देकर फोर्मलटी के लिए सहमती के तौर पर सिर्फ अपनी मुण्डी हिलाकर बार-बार " डोंट वोरी मोंम " कह देती थी।

पिता के लिए तो ब्रिटेन से भारत आना मानो दिल्ली से आगरा की ओवर नाईट जर्नी के समान था, और अपने माता-पिता के पास वो अक्सर साल-भर में जब-जब मौक़ा मिलता दसियों बार आ जाते थे। मगर रश्मी अपनी उस १५ साल की उम्र में पहली बार दादा-दादी से मिलने उनके देश, उनके गाँव आ रही थी। उसका जन्म और लालन-पालन ब्रेटन में ही हुआ था। रश्मी के पिता अपनी युवावस्था में एक हार्डवेयर इंजीनियर के तौर पर ब्रिटेन गए थे, और वहीं उनकी मुलाक़ात रश्मी की मम्मी अमृता से हुई थी, जो काफी पहले अपने माँ-बाप के साथ ब्रिटेन आकर बस गए थे। दोनों ने एक साल बाद वहीं ब्रिटेन में इक-दूजे संग शादी रचा ली थी। हालांकि रश्मि के दादा- दादी के अरमान कुछ और थे, मगर वे बेटे की खुशियों के आगे लाचार थे।

साढ़े आठ घंटे की हवाई और तदुपरांत तीन घंटे की सड़क यात्रा तय कर, रश्मि जब दादा-दादी के पास पहुंची तो मानो उनकी खुशी का कोई ठिकाना ही न था। दादाजी ने तो अपनी लाडली रश्मि को सर आँखों पर ही बिठा लिया था। अभी एक साल पहले ही तो वे लोग तकरीबन तीन महीने रश्मि के साथ ब्रिटेन में गुजारकर आये थे, और रश्मि का मृदु स्वभाव उनके रोम-रोम को जीत गया था। कस्बे में दादा-दादी और कस्बे वालो का प्यार पाकर रश्मि भी सब कुछ भुला बैठी थी, वह यह भी भूल गई थी कि उसकी मम्मी उसे ब्रिटेन में मिस कर रही होगी। उसे वहाँ के वातावरण और लोगो से घुलने- मिलने में तनिक भी परेशानी नहीं हुई थी, क्योंकि पश्चिमी सभ्यता के साथ-साथ माता-पिता, खासकर रश्मि के पिता ने उसे अपनी हिन्दुस्तानी संस्कृति से भी बखूबी जोड़े रखा था, उसे न सिर्फ हिन्दी बोलना सिखाया अपितु हिंदी और संस्कृत लिखना-पढ़ना भी सिखाया था। इसी का नतीजा था कि रश्मि अच्छी तरह से हिन्दी बोल, लिख और पढ़ सकती थी।

इस लाड-प्यार के बीच पखवाड़ा कब गुजर गया, रश्मि को पता भी न चला, इस बीच वह पिता के साथ एक पास के हिल स्टेशन भी घूम आई थी। और फिर एक दिन सुबह जब रश्मि उठकर बाहर आँगन में अखबार पढ़ रहे दादाजी के पास पहुँची तो दादाजी ने झट से पैर पसारे हुए पैरो के नीचे रखे मोड़े को पास खिसकाकर, रश्मि के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे वहां मोड़े पर बैठने को कहा। मोड़े पर बैठ रश्मि ने ज्यों ही अखबार हाथ में लिया, अखबार के फ्रंट पेज की मुख्य खबर पढ़कर और वहां छपे चित्र को देख वह एकदम चौंक सी गई। खबर यह थी कि जहरीली शराब पीने से उनके कस्बे के पास ही स्थित एक दूसरे कस्बे में २९ लोगो की मृत्यु हो गई थी। चित्र में कुछ लाशों के ऊपर विलाप करते परिजनों को दिखाया गया था। रश्मि ने कौतुहल बस खबर और चित्र के ऊपर उंगली टिकाते हुए दादाजी को जब संबोधित किया तो दादाजी ने दुखी मन से बस इतना कहा कि हाँ बेटा, क्या करे इनका इतना ही दाना-पानी था, मर गए सब। रश्मि ने सवाल किया, लेकिन दादाजी शराब जहरीली कैंसे हो गई होगी ? बेटा, कोई देशी ठर्रा पी गए होंगे, ये अभागे, सस्ते के चक्कर में ! दादाजी ने फिर संक्षिप्त जबाब दिया। तो क्या दादाजी, ये देशी शराब जहरीली भी होती है ? रश्मि ने फिर सवाल दागा । और दादाजी से नपा-तुला जबाब आया, बेटा, ये देशी माल कहाँ सही होता है, अनाप-सनाप ढंग से बनाते है। दादाजी के ये आख़िरी शब्द "देशी मॉल कहाँ सही होता है" रश्मि के अबोध मस्तिष्क पर हथोड़े की तरह प्रहार करने लगे थे।

तीन हफ्तों की इस अविस्मर्णीय भारत यात्रा के बाद आज रश्मि उदास मन से वापस ब्रिटेन लौट रही थी। लौटते में नई-दिल्ली तक के लिए उन्होंने ट्रेन पकड़ी थी। पापा के बगल में खिड़की के समीप वाली सीट पर बैठी रश्मि अभी- अभी ट्रेन में टोइलेट से होकर आई थी, और जिस वक्त वह ट्रेन के द्वितीय श्रेणी के वातानुकूलित डब्बे के टोइलेट के पास गई थी, तो पापा टोइलेट के बाहर तक उसके साथ आये थे। रश्मि ने ज्यों ही एक तरफ की टोइलेट का दरवाजा खोला था तो अन्दर मची गन्दगी को देख उसके मुह से तुरंत निकला 'ओह बॉय' ! उसके नाक पर हाथ रखने के अंदाज को भांपते हुए, उधर से गुजर रहे एक बुजुर्ग पेंट्री-मैंन ने रश्मि के पिता की तरफ देखते हुए, रश्मि को संबोधित करते हुए कहा था, ये देशी स्टाइल की टोइलेट है, आप बगल वाली में चले जाओ, वह वेस्टर्न है, और साफ़ है।

सीट पर खामोश बैठी रश्मि याद कर रही थी कि जब वह करीब नौ साल की थी और मम्मी के साथ बाजार गई थी, तो बाजार में उन्हें एक भारतीय युगल मिले थे। मम्मी थोड़ी देर तक उनसे बातें करती रही थी, और जब वे चले गए तो उत्सुकताबश रश्मि ने पुछा था कि मोंम ये कौन लोग थे ? और माँ ने अजीब सा मुह बनाते हुए कहा था कि अपने ही इधर के देशी लोग है। तभी पहली बार रश्मि का इस 'देशी' शब्द से पाला पडा था। मगर मम्मी के बताने के अंदाज और मुख मुद्रा से नन्ही रश्मि इतना तो समझ ही गई थी कि यह 'देशी' शब्द ज्यादा वजनदार नहीं है। फिर भारत आते वक्त मम्मी ने उसे बार-बार हिदायत दी थी कि वहाँ ज्यादा कूड़ा-करकट मत खरीदना, लोग देशी मॉल पर विलायती ठप्पा लगाकर माल को बेचते है। और फिर वह मनहूस दिन, जब उस देशी को पीने से वो २९ जिंदगियां हाथ धो बैठी थी। और तो और, जब वह पापा के साथ हिल-स्टेशन पर रात को जिस होटल में ठहरे थे, तो होटल मैनेजर ने तपाक से कहा था कि आपको कमरा सस्ता वाला चाहिए तो देशी स्टाइल का मिल जाएगा, और अगर महँगा चाहिए तो वेस्टर्न स्टाइल का मिलेगा।

पूरे घटनाक्रम को चलचित्र की भांति दिमाग पर दौडाते हुए और खिड़की से बहार झाँक रश्मि भारी मन से मंद-मंद मुस्कुरा दी थी। उसे लग रहा था कि जैसा कि मम्मी उसे बताया करती है, सच में यह देश मानसिक तौर पर अभी भी गुलाम है। वह तो सोचा करती थी कि अपने इस दादाजी-पितीजी के देश में "देशी" शब्द बड़ा ही आदरपूर्ण होता होगा। लेकिन यहाँ तो हर घटिया चीज को 'देशी' की संज्ञा दी जाती है।

Thursday, February 18, 2010

संघ की एक 'वृहत हिन्दू मंच' के तहत पिछड़ी दलित-दमित जातियों को साथ लेकर चलने की नई मुहीम कहीं हमारे कुछ समाज विज्ञानियों के पेट-दर्द का सबब न बन जाए।

डिस्क्लेमर: मैं संघ का किसी भी तरह का सदस्य नहीं हूँ !
इस देश में कुछ वो जयचंद वंशीय स्वार्थी तत्व जिन्हें सिर्फ और सिर्फ समाज को बांटे रखकर अपना उल्लू सीधा करना भाता है, अक्सर स्वयं सेवक संघ (आर एस एस ) पर यह आरोप लगाते रहे है कि यह हमेशा से सिर्फ हिन्दुओं के लिए खुला रहा है। यह खुले तौर पर कहता है कि यह हिन्दुओं के हितों की सेवा करने के लिए है। संघ ने कभी भी निचली जातियों या निचले वर्गों के हिन्दुओं के लिए कोई काम नहीं किया है। लेकिन अब जब आर एस एस दलित और निचली जातियों के लिए एक ख़ास मुहीम लेकर आया है तो इनके पेटों में दूसरी तरह का दर्द उठने लगा है , इन्हें यह भी याद दिलाना चाहूँगा कि संघ ने समरसता अभियान चलाकर दलितों व निम्न तबकों को जोड़ने पर पिछले दशकों में ज्यादा जोर दिया है, और आदिवासी दलित इलाको में इस सम्बन्ध में कुछ प्रशंसनीय कार्य भी किये। मगर यह बात किसी से छुपी नहीं है कि हमारे कुछ तथाकथित सेकुलरों और मिशनरियों को यह रास न आया, और परदे के पीछे रहकर इन्होने फिर विदेशो से इक्कट्ठा किये धन के प्रभाव से नक्सलियों के जरिये अपने कुकृत्यों और मंसूबो को अंजाम दिया, और आज भी दे रहे है। इनका बस एक ही मकसद है कि सुनियोजित ढंग से हिंदुस्तान को सदा के लिए इस तरह से बांटे रखा जाये कि ये कभी भी एक न हो सके, और इन जयचंद वंशियों की रोटियाँ सिकती रहें।

अक्सर बुद्धिजीवी वर्ग जब धर्म और देश हित के बारे में विचार करता है तो हिन्दू बुद्धिजीवियों की यह शिकायत रहती है कि चूँकि हम हिन्दू आपस में ही बंटे हुए है, इसलिए हम एकजुट होकर किसी दूसरे धर्म और देश का मुकाबला नहीं कर पाते। देश की कुल आवादी का १८-२० प्रतिशत वाला एक ख़ास वर्ग आज भी इस देश की राजनीति की दिशा मोड़ पाने में सक्षम है, क्योंकि हिन्दुओ में एकजुटता नहीं है। और इन सभी बातो पर गौर करने के बाद अभी जब हाल की बैठक में संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत की अध्यक्षता में यह फैसला लिया गया कि पिछड़ी दलित-दमित जातियों को साथ लेकर चलने की नई मुहीम पूरे देश में छेड़ी जाए, जिसके लिए कुछ उपायों के तहत इन जातियों के लोगो को भरोसा दिलाने हेतु और उन्हें एक वृहत हिन्दू मंच के तहत लाने हेतु कुछ संस्थाओ और पंथ प्रमुखों, जाति समाजों जैसे बाल्मीकि समाज, पासी समाज जैसे निचले समुदायों तथा दलित और पिछड़ों के बीच लोकप्रिय पंथ जैसे कबीर पंथ, वाल्मीकि पंथ वगैरह की मदद से हिन्दुओ के बिखरे समाज को एकजुट करने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि इन कुछ संस्थाओ के लिए हिन्दुत्व के मजबूतीकरण के प्रयासों को जोड़ना एक नयी चुनौती होगी क्योंकि इन कुछ संस्थाओ में कुछ अन्य धर्मो के लोग भी सम्मिलित है, मगर फिर भी अपने प्रयास के तहत आर एस एस हिन्दुत्ववादी राजनीति दलितों और निचले तबकों को अपनी राजनीति में शामिल करने के लिए अत्यन्त तेजी से अग्रसर हुई है।

और बस, इन्ही खबरों के चलते हमारे कुछ तथाकथित समाज विज्ञानियों की रातों की नींद और दिन का चैन हराम हो गया है। ये भला यह कैसे बर्दाश्त कर पायेंगे कि सभी हिन्दू एकजुट हो जाए ? अगर ऐसा हुआ तो फिर इनकी सत्ता डगमगाने लगेगी। ये अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पायेंगे, और इसी भय से ये लोग दुबले हुए जा रहे है। जातियों के बीच आपस में वैमनस्यता फैलाने की नई तरकीबो पर इनके शैतान दिमाग तेजी से चलने लगे है।

Tuesday, February 16, 2010

गलत निर्णय का खामियाजा !

लोकतंत्र में सरकार का चुनाव किसी स्कूल की उस माध्यमिक बोर्ड की परिक्षा के समान है, जिसमे उत्तीर्ण होने वाला विद्यार्थी आगे चलकर अपने और देश के उज्जवल भविष्य की नीव रखता है। मगर यदि एक विद्यार्थी जो न सिर्फ पढ़ाई में एकदम गया गुजरा हो, बल्कि किसी भी दृष्ठिकोंण से उत्तीर्ण होने के काबिल ही न हो, और मूल्यांकनकर्ता जबरन उसे न सिर्फ उत्तीर्ण कर दे, अपितु उसे अब्बल नंबर भी दे दे, तो आप सहज अंदाजा लगा सकते है कि आगे चलकर उस विद्यार्थी के हाथों उस देश का भविष्य क्या होगा, जिसका वह नागरिक है। ठीक यही हाल केंद्र की मौजूदा सरकार का भी है। यह जानते हुए भी कि क्या महंगाई का मुद्दा, क्या आर्थिक मुद्दा, क्या विदेश नीति का मुद्दा, क्या बेरोजगारी का मुद्दा, क्या ढांचागत विकास का मुद्दा, क्या आतंकवाद का मुद्दा, क्या क़ानून और व्यवस्था का मुद्दा, न सिर्फ एक मुद्दे पर अपितु लगभग सभी मुद्दों पर पिछले कार्यकाल के दौरान यह सरकार पूर्णतया विफल रही थी। इस देश के वोटर ने दूसरे कार्यकाल का जिम्मा भी उन्ही को सौंप दिया, यानि एक अनुत्तीर्ण विद्यार्थी को जबरन पास कर दिया, तो खामियाजा भी भुगतना ही होगा। बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाए ? इसके खामियाजे अब साफ़ परिलक्षित भी होने लगे है। २६/११ के बाद प्रदर्शित की गई नपुंसकता का ही परिणाम है कि आज उनके आंका मुजफ्फराबाद और लाहोर से मंच पर चड़कर हिन्दुस्तान, उसके प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को खुलेआम गालिया दे रहे है। क्योंकि उन्होंने भी भांप लिया है कि इनके बस का कुछ नहीं, सिर्फ हवाई तीर छोड़ने में उस्ताद है, बस।


दूसरी तरफ, हमारी अदूरदर्शिता, अपरिपक्वता और निर्णय की दिशाहीनता का ही परिणाम है कि देश के अन्दर मौजूद नक्सलियों और मावोवादियों का दुस्साहस इस कदर बढ़ गया है कि वे खुले-आम चुनौती देने लगे है। मगर सरकार है कि हाथ पर हाथ धरे बैठी है। जरा सोचिये, जो जवान मारे गए है, उनकी जगह सरकार में बैठे इन लोगो के अपने बेटे होते तो क्या फिर भी ये लोग इसे तरह की कोताही बरतते? मगर हमारी इस शासन प्रणाली की सबसे बड़ी विडम्बना तो यही है कि जो सुरक्षाबल इन भ्रष्ट और अकर्मण्य लोगो की नीतियों का शिकार हो रहे है, वही इन अकर्मण्य लोगो और उनके परिवारों की रात दिन सुरक्षा में मस्तैद है। जनता भले ही जान हथेली पर रखकर घर से बाहर निकलती हो, मगर इनके तो कुत्ते-बिल्लियों और मूर्तियों को भी सरकारी सुरक्षा प्रदान है। ऐसा नहीं है कि इन्हें चुनने का दोष सिर्फ अशिक्षित वोटरों पर ही डाला जाए, जो इस देश के तथाकथित शिक्षित और सेक्युलर वोटर है उनसे भी मैं सवाल करूँगा कि हालांकि मैंगलोर में प्रमोद मुथालिक और उसकी ब्रिगेड ने पिछले साल जो कुछ किया वह गलत था, मगर जब उसके प्रतिक्रियास्वरूप आप लोग उसे चद्दियाँ भेज सकते है तो क्या आपमें इतनी भी हिम्मत बाकी नहीं कि कुछ बुर्के और चूडियाँ इस सरकार में बैठे नुमाइंदों को भी भेज सको? हालांकि आज के लगभग सभी नेता एक ही थाली के चट्टे-बट्टे नजर आते है, मगर इतना तो है कि जहां और जितने भी राज्यों में आज बीजेपी और उसके सहयोगी दलों की सरकारे है, वहां कम से कम विकास की चर्चा तो होती है। क्या गुजरात, क्या बिहार, क्या छतीसगढ़, क्या मध्य प्रदेश, वहाँ भले ही जरा सा सही मगर कोई तो विकास के आंकड़े दे रहा है, इन्होने तो पिछले साठ सालो में सिर्फ अपना घर भरा।

Friday, February 12, 2010

एक छोटा सा ख़त भोलेनाथ के नाम !


सर्वप्रथम सभी शिव भक्तो  को मेरी तरफ से महाशिवरात्री पर्व की बधाई और ढेरो शुभकामनाये !
आज इस पावन अवसर पर एक छोटा सा ख़त भोलेनाथ के नाम ;हे भोलेनाथ !
अब इतने  भी भोले मत बनो,
कृपया मेरी बात गौर से सुनो,
मैंने अपने पूर्वजो से सूना था,
 आपके पास तीसरी आँख भी है,
और अपने इस देश पर आपकी  

हमेशा रहती तांक-झाँक भी है !
अपनी तो पैदाइसी बुद्धि  मंद है,
तीसरी की छोडो, अपुन को लगता है
आपकी तो दो आँखे भी बंद हैं  !
इस देश की यह हालत न होती,
अगर सचमुच ऐसी बात न होती,
चारो तरफ मचा हां-हाकार न होता,
शठों को मिली ऐसी सौगात न होती !
अगर  सच में तीसरी आँख रखते हो,
तो कृपा करके अब उसे खोल दो,
"बम' बोलने का अब ज़माना गया,
शब्दों को नहीं, क्रिया को मोल दो !
आपका एक भक्त - 'परचेत' !

Tuesday, February 9, 2010

क्या वोट-बैंक सचमुच इतना अक्लमंद है ?

यूँ तो इस देश की सबसे बड़ी बिडम्बना ही यह है कि यहाँ कुछ भी निश्चित (दृड, ठोस) नहीं है! एक तरफ तो हम और हमारा संविधान कहता है कि देश के सभी नागरिक समान है, कोई रंग-भेद, जाति-वर्ण, धर्म इत्यादि का फर्क नहीं है! और यदि इसमें कोई भेद करता है तो उसके खिलाफ सख्त क़ानून है! एवं दूसरी तरफ सरकारी नौकरी पाने और अपने फायदे के लिए भिन्न-भिन्न राजनैतिक दलों की सरकारें तथा वे स्वार्थी लोग, जिन्हें इसमें फायदा दीखता है, खुद ही जाति-धर्म के आधार पर समाज को बांटने पर तुले है ! तब ये समानता की परिभाषा भूल जाते है! मेरा यह तर्क है कि जब कोई पिछड़ा अल्प्संखयक अथवा दलित यह कहता है कि चूँकि उन्हें हमारे समाज में बहुसंख्यको और उच्च जाति कि लोगो ने शोषित किया, इसलिए उन्हें अपना उत्थान करने के लिए संरक्षण/ आरक्षण जरूरी है तो भाई साहब, चाहे जिन भी कारणों से भूतकाल में सवर्णों और बहुसंख्यको ने आपको शोषित किया हो, तो क्या उसका बदला आप आज की पीढी पर निकालोगे, उनके हक़ और अधिकार मारकर ? आज जब आपकी चल रही है तब आप जमकर कानूनों और अपने ओहदे का जहां तक हो पाता है खूब दुरुपयोग कर रहे है, और इसे आप सही भी मानते है तो जब पूर्व में सवर्णों और बहुसंख्यको की चलती थी, और उन्होंने आपका शोषण किया तो क्या गलत किया? आज आप भी तो वही सब कर रहे है, उनमे और आप में फर्क क्या है ?

यह तो सर्वविदित है कि सरकारे सिर्फ अपने फायदे और राजनीति में वोट के लिए यह बांटने का खेल खेलती है, अगर ऐसा न होता तो इन समाज के गरीब और शोषित लोगो के रहन-सहन के उत्थान और इनको शैक्षणिक सुविधाए मुहैया कराने से हमारी सरकारों को किसने रोका था ? लोगो के उत्थान के लिए बेहतर माहौल और सुविधाए मुहैया करा सकते थे, ताकि गरीब और दलित का बेटा-बेटी भी समाज के अन्य तबको के बच्चो से एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के योग्य बन पाते ! मगर जहां प्रतियोगिता के माध्यम से श्रेष्ठता की बात आती, वहा बिना किसी भेद-भाव के सभी को उचित अवसर दिया जाता ! इस आरक्षण से फायदे की बजाये देश का नुकशान ही अधिक हो रहा है , क्योंकि आरक्षण के जरिये अकुशल और भ्रष्ट लोग शासन पर काविज हो गए है! नतीजा यह है कि आज देश भ्रष्टाचार से बूरी तरह जूझ रहा है! शासन निरंकुश है, और ये राजनेता तो यही चाहते थे कि देश में नालायको की फ़ौज खडी हो जाए, ताकि ये अपने मन मुताविक उन्हें नचा सके !

अब मुख्य टोपिक पर आता हूँ, चुनाव से पहले आंध्र प्रदेश में हमारी धर्म निरपेक्ष सरकार ने वोट बैक को हासिल करने के लिए ४% आरक्षण का चारा फेंका था, जिसे कल ही वहां के हाईकोर्ट ने नकार दिया, क्योंकि यह उचित नहीं था! चूँकि अब वहाँ चुनाव हो चुके, तो लगता है फिलहाल उस चारे की हमारे सेक्युलर नेताओं को जायदा अहमियत नजर नहीं आती! मगर एक तरफ जहां आंध्रा के उच्च न्यायालय ने इसे गलत करार दिया वही पश्चिम बंगाल सरकार ने १०% का चारा वहां भी फिर से फ़ेंक दिया, क्योंकि अब वहाँ भी चुनाव सर पर है ! और पिछले दो सालो से वहाँ पर कम्यूनिस्टो की हालत पतली चल रही है! यूँ तो पश्चिम बंगाल में वोट बैंक कम्यूनिस्टो का चुनाव जीतने का एक प्रमुख हथियार रहा है, क्योंकि वहाँ क़रीब 28 फ़ीसदी मुसलमान हैं, और उनके वोट भी पारंपरिक और ज़रूरत के हिसाब से वाम मोर्चे को ही जाते रहे हैं ! इनमें से कई वाम मोर्चे की मेहरबानी से सीमा पार से आकर बसे हैं ! ये वोट भी वाम मोर्चे की मुट्ठी में रहा है फिर वोटर जनता को चुनाव बूथों तक लाने का काम लाल ब्रिगेड की युवा शक्ति बख़ूबी करती आयी है ! लेकिन अब उन्हें ममता बनर्जी की तरफ से जो कड़ी टक्कर मिली है, तो उनको अपना भविष्य डांवाडोल नजर आने लगा !

खैर, अपने इन राजनेतावो की तो कहाँ तक तारीफ़ करे, मगर मुझे आश्चर्य उस वोट बैंक पर होता है जिसे ये इस्तेमाल कर रहे है, अपने फायदे के लिए ! क्या वोट-बैंक वाले इतना भी नहीं समझते कि इनका उद्देश्य क्या है ? कल चुनाव हो जायेंगे तो वहाँ भी आन्ध्रा की तर्ज पर कोई कोर्ट आरक्षण को अवैध करार देगा! और ये फिर से कहलायेंगे, बहुसंख्यको द्वारा शोषित लोग ! मगर लाख टके का सवाल यह है कि इन राजनेताओ को इस वोट बैंक को इतना बुद्धिमान समझने का नुख्सा दिया किसने
?


वो जो कुछ
निक्कमे, निर्लज,misfit थे,
आज राजनीति में fit हो गए !
खुद के
विकसित होने की
जल्दवाजी में,
बिक गए और shit हो गए !!

Monday, February 8, 2010

वजन घटाना है तो ऊँचे पहाड़ो पर जाइए !

अगर आप बिना कोई व्यायाम किये, बिना अपनी खान-पान की खुराक में कमी किये, वजन घटाना चाहते है, तो वैज्ञानिक कहते है कि कुछ हफ्तों के लिए ऊँचाई वाले(high altitude )स्थानों पर चले जाइए! आपका वजन स्वतः ही कम हो जाएगा ! अपने एक अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे है कि ऊँचाई वाले स्थानों पर मात्र एक हफ्ता बिताने के परिणामस्वरूप भी निरंतर वजन में कमी आती है! http://www.wired.com/wiredscience/2010/02/high-altitude-weight-loss/ अध्ययन के मुताविक अधिक वजन के गतिहीन लोग जिन्होंने एक हफ्ता ८७०० फीट की ऊँचाई पर बिना अपनी डाईट में कोई कमी किये, और नही कोई शारीरिक कसरत किये व्यतीत किये थे, और जब वे एक महीने बाद वापस मैदानों पर लौटे तो उनका वजन पहले के उनके वजन का दो तिहाई ही रह गया था ! मजेदार बात यह है कि यह अध्ययन स्पष्ट रूप से यह भी दर्शाता है कि इससे उनका गर्मी सेवन (caloric intake ) भी घट गया!

और यह बात शर्तिया तौर पर भी इस आधार पर कही जा सकती है कि जैसा कि आपने भी गौर किया होगा कि पहाडी क्षेत्रो के लोग अक्सर औसत शरीर के और चुस्त-दुरुस्त होते है! और यह बात तो शायद यहाँ बताना अतिश्योक्ति होगी कि चुस्त-दुरुस्त शरीर ही बीमारियों से मुक्त भी होता है! इस अध्ययन के बाद कुछ लोग जो नियमित तौर पर हवाई यात्रा करते है, उन्होंने भी इस बात की पुष्ठी की है कि चूँकि वे विमान से लगातार ८००० मीटर की ऊंचाई पर यात्रा करते है इसलिए उनके वजन में भी आश्चर्यजनक तौर पर कमी आई है! भारतीय सेना के एक अधिकारी का कहना है कि मैं इस बात से सहमत हूँ कि ऊंचाई में रहने पर वजन कम करने में मदद मिलती है, मैं दो बार कुमाऊं हिमालय में ऊंचाई वाले क्षेत्र में और पूर्वोत्तर तथा सियाचिन में रहा हूँ , और मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि ऊंचाई पर रहने में मोटापा जादुवी ढंग से गायब होता है, बशर्ते आप वहाँ पर घुमते फिरते रहे, और सर्दी से बचने के लिए बहुत ज्यादा गर्म कपड़ो का इस्तेमाल न करे तो ! यह शरीर की वसा और कैलोरी को जलने में मददगार साबित होता है ! तो दोस्तों, देर किस बात की, आने वाली गर्मियों में खूब पहाडो की सैर का लुफ्त उठायें, और शरीर को स्वस्थ रखे !

Saturday, February 6, 2010

आस्तीन के सांप !

जैसा कि आप लोग भी जानते होंगे, एक खबर के मुताविक हाल ही में आजमगढ़ से पकडे गए इंडियन मुजाहीदीन के आतंकवादी शहजाद आलम ने खुलासा किया है कि सितम्बर २००८ में बटला हाउस एंकाउन्टर से फरार होने में और उन्हें पनाह देने तथा आर्थिक मदद देने में दिल्ली का एक पूर्व विधायक शामिल था! विधायक का नाम भले ही अभी गुप्त रखा जा रहा हो , मगर आप और हम अनुमान तो लगा ही सकते है कि वह जैचंद कौन हो सकता है! अब इस खुलासे को भले ही बाद में अपने राजनैतिक लाभ के लिए ये हमारे राजनैतिक गण तोड़-मरोड़कर जो मर्जी अमली जामा पहनाये, इस जांच-पड़ताल का जो मर्जी हश्र हो, लेकिन यह शायद आप लोग भी न भूले हों कि कैसे इन आतंकवादियों का सपा और तृणमूल कौंग्रेस ने कुछ अन्य दलों के साथ मिलकर महिमा मंडन किया था, उन्हें अपनी तरफ से हर्जाना दिया था और किसतरह कौंग्रेस ने अपना एक सिपहसलार हाल ही में आजमगढ़ भेजकर वोट बैंक की सहानुभूति बटोरनी चाही ! और दूसरी तरफ इस देश के जिस बहादुर सिपाही, इन्स्पेक्टर शर्मा ने इनसे लोहा लेते हुए अपने प्राण न्योछावर किये, उसका परिवार आज तक मूलभूत सुविधाओ के लिए ठोकर खाने को मजबूर है ! ये आस्तीन के सांप जिस थाली में खा रहे है, उसी में छेद करने पर आमादा है ! ये है वो देश के असली दुश्मन, जिनमे वोट बैंक के लिए हमारे राजनैतिक दलों और इनके हिमायती तथाकथित सेक्युलरो को कोई खोट नजर नहीं आता !

Friday, February 5, 2010

कौंग्रेस की इस राजनीति पर तथाकथित सेक्युलर खामोश क्यों ?

यह तो सभी जानते है कि 'फूट डालो और राज करो', यह गुरु-मन्त्र कौंग्रेस को विरासत में अंग्रेजो से मिला था, मगर वोट के लिए वे इतने छोटे दर्जे की राजनीति पर उतर आयेंगे कि इनके सिपहसलार यह भी भूल जांए कि उनके इस गैर-जिम्मेदाराना कदम से देश की सुरक्षा पर क्या असर पडेगा, तो निश्चित तौर पर यह सब इस देश के लिए एक चिंता का विषय है ! तुष्टीकरण और वोट बैंक की अपनी राजनीति के तहत कौंग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने जिस तरह आजमगढ़ के संजरपुर जाकर उन परिवारों से मिलकर , जिनके घर के युवा दहशतगर्दी में आरोपित हैं, बाद में बटला हाउस मुठभेड़ पर सवाल उठाते हुए यह कहा कि उन्होंने खुद बाटला हाउस में हुए मुठभेड़ में मारे गए दो युवकों के फोटोग्राफ देखे थे, जिसमें एक लड़के की सिर में गोली लगी थी, मुठभेड़ में सामने से गोली चलेगी तो पेट या सीने में लगेगी न कि सिर पर !

अब इनके इस बयान को हास्यास्पद न कहा जाए तो और क्या कहेंगे ? इन जनाव को इतना भी अहसास नहीं कि जब सामने से गोलियों की बौछार आ रही हो तो निशाने पर खडा व्यक्ति अपने को बचाने के लिए स्वाभाविक तौर पर सिर नीचे झुकाता है, और यदि पहले ही पेट में गोली लग गई हो तो गिरते वक्त आगे को झुकता है, तो सिर पर गोली लगना लाजमी है ! मगर लगता है, वोट बैंक ने इनकी इतना सोचने की क्षमता भी ख़त्म कर दी है ! IBN7 की ताजा खबर के मुताविक, किरकिरी होते देख श्री सिंह ने अब कहा है कि उन्होंने आजमगढ़ जाने के लिए श्रीमती सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी से अनुमति ली थी ! अगर यह बात सच है तो विषय और भी चिंताजनक हो जाता है, क्योंकि श्रीमती सोनिया गांधी यह भूल रही है कि मुठभेड़ के समय केंद्र और राज्य दोनों में उन्ही की सरकार थी, जिन्हें वे खुद ही परोक्ष रूप से चला रही है ! और यदि मुठभेड़ झूठी थी, तो उनकी नैतिक जिम्मेदारी क्या बनती है? खैर, कौंग्रेस की इस राजनीति से तो सभी वाकिफ है मगर आश्चर्य इस बात का है कि हमारे इन तथाकथित सेक्युलरों के मुह पर क्यों ताले लगे है? अगर यही सब कुछ बीजेपी ने किया होता तो अब तक इनका संगीत फुल वोल्यूम पर होता !

Thursday, February 4, 2010

जीना तो बस टाइम पास रह गया !

मकसद न अब जीने का, यहां कुछ ख़ास रह गया,
यूँ  लगे है कि जीना तो बस, टाइम पास रह गया।

ढोये जा रहे बोझ को, मानो  किसी कुली की तरह,
गाडी आई-गई, स्टेशन का ही अहसास रह गया।  


कोई न हमसफ़र,चले अकेला मंजिल-ए-मुसाफिर,
बेरहम  है ये दुनिया, सोचके दिल उदास रह गया।

खुद के पैमानों पर जीना चाहते थे जिन्दगी मगर,
वक्त की ठोकर में अटका, कतरा-ए-सांस रह गया।

सोचते थे यों कि  हमेशा चलेंगे शुतुरमुर्ग की चाल ,
बैसाखियों पर सिमटा ,बन्दा-ए-बिंदास रह गया।  

क्या गजब का शिगूफा छोड़ा है, माननीय !


देखा गया है कि हम हिन्दुस्तानियों की याददास्त बहुत कमजोर होती है, और शायद यही वजह रही होगी कि एक गुलामी झेलने के बावजूद भी दूसरी गुलामी हमारे सिर पा आ बैठी थी क्योंकि ये भुल्लकड़ हिन्दुस्तानी पिछली गुलामी की मार को भूल गए थे और इसी तरह दूसरी, दूसरे के बाद तीसरी और फिर उसके बाद चौथी गुलामी आराम से यहाँ पैर पसारती रही। भ्रष्टता के लिए हम लोग रोज नए नए फोर्मुले इजाद करते रहते है इसलिए याददाश्त कमजोर हो जाती है। अत: याद दिलाना चाहूँगा कि आज से ठीक एक साल पहले व्यापारी सुभाषचन्द्र अग्रवाल ने प्रधानमंत्री कार्यालय पर केन्द्रीय मंत्रियों और उनके रिश्तेदारों की सम्पति के ब्योरे का जानकारी नहीं देने का आरोप लगाते हुए कहा था कि कार्यालय ने इस मामले पर पलटी मार ली है।

श्री अग्रवाल ने सूचना के अधिकार कानून के तहत आवेदन देकर मंत्रियों और उनके रिश्तेदारों की सम्पति का ब्योरा माँगा था। उन्होंने बताया प्रधानमंत्री कार्यालय शुरुआत में यह जानकारी देने को तैयार हो गया था, पर 17 दिसम्बर 2008 के एक पत्र में उसने पलटी मारते हुए कहा कि माँगी गई जानकारी सूचना के अधिकार कानून की 8.1 (ई) और 8.1. (जे) के तहत व्यक्तिगत जानकारी बनती है। अतः इसका खुलासा नहीं किया जा सकता। अग्रवाल ने जब यह जानकारी लेने के अनेक प्रयास किए तो 27 जनवरी २००९ को प्रधानमंत्री कार्यालय से उन्हें पुन नकारात्मक जवाब मिला। आवेदनकर्ता ने एक टीवी चैनल को बताया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मंत्रियों की सम्पति की जानकारी 19 मई 2008 को कैबिनेट सचिवालय को दी है, ताकि सूचना के अधिकार कानून के तहत इसकी जानकारी माँगने पर दी जा सके। श्री अग्रवाल ने तब केन्द्रीय सूचना आयोग में अपील की । इसके मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा जवाब बदलने का कारण पूछे जाने का जिक्र था । उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय के इस निर्णय ने सरकार की प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की ईमानदारी पर प्रश्न खड़ा कर दिया।

किरकिरी हुई तो अपने को पुन: जनता की नजरों में एक भला( भोला-भाला और ईमानदार ) व्यक्ति साबित करने के लिए माननीय ने एक और नया शिगूफा छोड़ दिया है कि मंत्री और उनके रिश्तेदार फलां-फलां होमवर्क करें । लेकिन माननीय जी आपके ही राजनैतिक कुनवे में सुनता कौन है? याद दिलाना चाहूंगा कि पिछले लोकसभा कार्यकाल के दौरान भी इन सब नियमो को ताक पर रखकर करीब २० मंत्रियों ने अपनी संपत्ति का व्योरा नहीं दिया था ।

अत: कहना चाहता हूँ कि आपके पिट्ठू खबरिया चैनल जैसे कि इस सदी के महाभ्रष्ट और श्री रामगोपाल वर्मा की हाल में रिलीज फ़िल्म के किरदार इण्डिया २४/७ ( महाभ्रष्ट इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मेरा मानना है कि मीडिया में जो भी बुराइयां आज हमें दिखती है, यही चैनल इन सब बुराइयों की जननी है ) आपकी जितनी मर्जी तारीफ़ करे, लेकिन क्या आपने कभी सोचा और यह देखने की कोशिश की कि देश की जनता जो आज इस भ्रष्टाचार के महादलदल में बुरी तरह पिस रही है, वो आपके बारे में क्या सोचती है? यह तो आप मानोगे कि पिछले ५-७ सालो में यह भ्रष्टता का दलदल अपनी सारी सीमाए लांघ चुका है । और अभी जो आपने यह शिगूफा छोड़ा है , यदि इसके बावजूद भी आपके मंत्री आपके आदेश का पालन नहीं करते, तो क्या आप उन्हें बर्खास्त करेंगे , या फिर खुद इस्तीफ़ा देंगे ? अथवा यह महज जनता की आँखों में धूल झोकने का एक और प्रयास मात्र समझा जाए ? एक महिला आरक्षण विधेयक था जो युगों से आपके दफ्तर की धूल चाट रहा है , क्यों ? सिर्फ इस डर के बहाने से कि जो आदमी अपनी बहु तक को संसद में बिठाना चाहता है, वही अपने समाजवाद की परिभाषा के अनुरूप किसी और की बहु को सदन में नहीं देखना चाहता ? क्या ही अच्छा होता कि आप एक क़ानून बनाते कि राजनीति के लिए पोलिटिकल मैनेजमेंट एक अनिवार्य डिग्री हो और किसी और पेशे का व्यक्ति राजनीति में न आये, वकील वकालात करे, राजनीति नहीं, क्योंकि आज की राजनीति की सारी बुराइयों को क़ानून के उलटे सीधे दावपेंच इन्ही दूसरे प्रोफेशन के लोगो ने राजनीति में आकर भ्रष्ट नेताओं को दिए है।

Wednesday, February 3, 2010

यही द्वन्द होने लगा है !


दिल का धैर्य 
मंद होने लगा है ,
झंकृत भावनाओं का  
हर छंद होने लगा है,
है यहाँ अब कोई 
अपना  भी चाहने वाला ,
मन को ऐसा  ही कुछ 
द्वंद  होने लगा है। 

दरिन्दे - इंसानियत के असली दुश्मन !

एक तरफ इन्सान ( बुद्धिजीवी, वैज्ञानिक, डॉक्टर , इंजीनियर इत्यादि ) दूसरे इंसानों के जीवन को सरल और सुखमय बनाने के लिए दिन रात मेहनत कर, अपने जीवन की भोग विलासिता को त्यागकर पूर्ण रूप से अनुसंधानों को समर्पित किये हुए है, और दूसरी तरफ इस धरा पर ये पाषण युगीन निश्चर भी मौजूद है ; (नोट: भले ही इस कडवी सच्चाई को कुछ बुद्दिजीवी लोग, मेरी पता नहीं कौन सी मानसिकता का खिताब दे, मगर ऐसी खबरों को प्राथमिकता देने का उद्देश्य बिना किसी धार्मिक भेदभाव के आज के इस तथाकथित सभ्य समाज में इन सोये हुए लोगो को मेरा जगाने भर का प्रयास मात्र है )


खबर:
Tuesday,02 February , 2010 -12:25 A 12-year-old Saudi girl unexpectedly gave up her petition for divorce from an 80-year-old man her father forced her to marry in exchange for a dowry, Saudi media reported Tuesday.

Despite support from human rights lawyers and child welfare advocates, the girl and her mother, who originally sought the divorce, withdrew the case Monday in a court in Buraidah, in Al-Qasim province, newspapers said.

The girl told the court that her marriage to the man was done with her agreement, according to Okaz newspaper.

"I agree to the marriage. I have no objection. This is in filial respect to my father and obedience to his wish," she said.

Saleh al-Dabibi, a lawyer supplied by a charity group to help the girl, said her mother did not inform him of the change of heart, Okaz said.

An unnamed official of the government's Human Rights Commission, which was originally asked by the mother to help in getting the marriage annulled, told Arab News they too were surprised by the mother and daughter dropping the case.

The influential daughter of King Abdullah, Princess Adela bint Abdullah, expressed concern over the girl's marriage.

"I, personally, and many specialists in social and education fields, share the opinion" that it is in violation of children's rights, Al-Riyadh newspaper reported.

"A child has the right to live her childhood and not be forced to get married. Even an adult would not accept that," she said.

According to reports, the girl's father, who is separated from her mother, arranged her marriage to the 80-year-old last September in exchange for a dowry payment of 85,000 riyals (22,667 dollars).

The case caused an uproar after Al-Riyadh newspaper first reported it in early January, saying the marriage had been consummated and quoting the girl as pleading to the journalist to "save me."

Her mother, who is unidentified in local reports, petitioned the court to annul the marriage and charged that the girl had been raped.

The case was to be heard Monday, but reports said the mother dropped the complaint ahead of the hearing.

Saudi Arabia has no law against child marriage, and clerics and religious judges justify the practice based on Islamic and Saudi tradition.

But human rights officials have been pushing for a law that would set a minimum marriage age of 16 or higher.

In January, senior cleric Sheikh Abdullah al-Manie told Okaz that the Prophet Mohammed's marriage to a nine-year-old girl some 14 centuries ago cannot be used to justify child marriages today.

Manie, a member of the Council of Senior Ulema (scholars), said that circumstances are different today from when the Prophet Mohammed married young Aisha.

Aisha's marriage "cannot be equated with child marriages today because the conditions and circumstances are not the same," he said.

खबर http://arabia.msn.com/News से साभार !

Tuesday, February 2, 2010

सीमाए लांघता सरकारी धन का दुरुपयोग !

बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और गरीबी पर अंकुश लगाने के लिए बहुप्रचारित दैनिक जीवन में सादगी (austerity ) अपनाने की कौंग्रेस की बात वहाँ ख़त्म हो गई दीखती है, जहां एक दिन राहुल भैया, पूरे गाजे-बाजे और बीच राह में कुछ छुटभैयों द्वारा प्रायोजित पथराव की नौटंकी के साथ पंजाब से दिल्ली रेल में बैठकर आ गए ! देश जहां एक तरफ महंगाई की मार से त्राहिमान-त्राहिमान कर रहा है, और सरकार सरकारी फंड में कमी का रोना रोकर सरकारी नियंत्रण वाली आम उपभोग की वस्तुओ के दाम बढ़ाने का बहाना ढूंढ रही है, वहीं दूसरी तरफ यही सरकारें, किस तरह सरकारी धन का दुरुपयोग कर रही है, उसके कुछ उदाहरण मैं यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ ;


कल मैंने ब्लॉग जगत पर झूटा सच ब्लॉग http://jhoothasach.blogspot.com/2010/02/blog-post.html के आदरणीय कविराज जोशी जी का एक लेख पढ़ रहा था, जिसमे उन्होंने एक खबर का जिक्र किया था कि ३७५०० किलोमीटर लम्बे राष्ट्रीय राज मार्ग पर हर २५ किलोमीटर पर श्रीमती सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह के फ़ोटो वाले २०x१० फुट के होर्डिंग लगेंगे ! इनकी संख्या १४८८ होगी और हरेक होर्डिंग पर दो लाख रुपये का खर्चा आएगा ! एक और खबर के मुताविक अभी कुछ दिनों पहले एक सर्वे हुआ था, पूर्व स्वर्गीय प्रधानमंत्रियों के ऊपर होने वाले खर्च के बारे में, जिसमे यह निष्कर्ष दिया गया था कि जितना खर्च पिछले दो महीने में स्वर्गीय राजीव गांधी के नाम पर किया गया है, उतना पिछले दस सालो में स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी के ऊपर नहीं हुआ ! ज्यादा दूर न जाकर अभी इस सरकार के अपने राजनैतिक हितो को साधने के लिए उत्तर पूर्व के एक राज्य में एक साथ चार मुख्यमंत्री बिठाने के तुगलकी फरमान का ही उदाहरण आप ले सकते है! चार मुख्यमंत्री अपनी पार्टी की सरकार को चलाने के लिए बना तो लेंगे मगर उनका खर्चा ( मुख्यमंत्री रुतवे सहित ) किसके सिर पर पडेगा , कभी सोचा किसी ने ? देश में आम हितो से सम्बंधित बहुत से विधेयक सदनों में लंबित पड़े है, या फिर इनके पास आपसी तू-तू, मै-मै के नियोजित नाटक में विधेयक रखने की ही फुरसत ही नहीं, मगर, जब इनके रिश्तेदारों को सरकारी खर्च पर फ्री में हवाई यात्रा कराने का विधेयक आया तो झट से पास हो गया! यह है इस सरकार की सादगी ! हर चीज की एक सीमा होती है, देश के लोग मूलभूल जरूरतों के लिए तरस रहे है और ये है कि ...वक्त आ गया है कि अब हर नागरिक उठ खडा हो और हक़ मांगे, वरना सरकार में बैठे ये लोग एक-एक देशवासी को इसी तरह तिल-तिल कर मरने को मजबूर करते रहेंगे !

Monday, February 1, 2010

हे कृष्ण ! तुम्हारा क्या पक्ष है ?

आज तो सवालों के घेरे में घिरा, स्वयं यक्ष है,
पक्षपातियों के चंगुल में फंस चुका,निष्पक्ष है।

दर-दर की ठोकरें खाता, ईमान का सुत दीन है,
शठ का बेटा कपट, भ्रष्टता में हुए जा रहा दक्ष है।

धुर्तों के कक्ष में तो हर शाम मनती है दीवाली,
वीरान-सुनशान सा पडा हरीशचंद्र का कक्ष है।

चोर-उचक्के, लुच्चे-लफंगे, गद्दी पे काबिज हो गए,
और कौए जहां मूंग दल रहे, वो हंस का वक्ष है।  

कृष्ण भी भूल गए शायद, 'यदा-यदा ही धर्मस्य',
 बीज बोया था जैंसा,फल भी वैसा हमारे समक्ष है।    

दिल्ली/एनसीआर, क्या चिकित्सा मर्ज का मूल मेदांता सरीखे अस्पताल नहीं ?

  चूँकि दिल्ली के मैक्स और हरियाणा  के  फोर्टिस अस्पताल का मुद्दा गरम है, इसलिए इस प्रसंग को उठाना जायज समझता हूँ। पिछले कुछ दशकों से अधिक...