Thursday, November 6, 2025

झूम-झूम !

हमेशा झूमते रहो सुबह से शाम तक,

बोतल के नीचे के आखिरी जाम तक,

खाली हो जाए तो भी जीभ टक-टका,

तब तलक जीभाएं, हलक आराम तक।

झूमती जिंदगी, तुम क्या जान पाओगे?

अरे कमीनों ! पाप जिसे निगल जाएगा

तुम्हारे न चाहते हुए भी, ठग बहराम तक।



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उलझनें

 थोडी सी बेरुखी से  हमसे जो उन्होंने पूछा था कि वफा क्या है, हंसकर हमने भी कह दिया कि मुक्तसर सी जिंदगी मे रखा क्या है!!