Saturday, August 7, 2010

ये अहसान फरामोश भिखमंगे !

मेरा मानना है कि विपदा में फंसा हर प्राणी सबसे असहाय होता है, और हमने जहां तक इस भारत भूमि का इतिहास है, अपने पूर्वजों के मुख से, अपने पौराणिक गर्न्थों में, अपने संस्कारों में यही पाया है, यही पढ़ा है कि इंसान तो छोडिये, विपदा में फंसे प्राणी की पशु-पक्षी भी मदद करते है! किस्से-कहानियों में अक्सर जाल में फंसे शेर और चूहे की कहानी, डूबती चींटी और चिड़िया जैसी अनेकों कहानिया तो आपने भी पढी होंगी ! मानवता के नाते एक विवेकशील इंसान का यही परमधर्म होता है कि अपनी काविलियत के हिसाब से, मुसीबत में फसे जरूरतमंद की यथोचित मदद करे! यही इंसानियत का सार है,और यह भी कह लीजिये कि एक सच्चा धर्म भी यही है! और मैं यह भी खूब समझता हूँ कि शायद उससे बढ़कर और कोई बेरहम इंसान इस दुनिया में नहीं सकता , जो दो शब्द सम्वेदना और सहानुभूति के न कहकर, पीड़ितों का उपहास उडाये !


अपना एक पड़ोसी मुल्क है पाकिस्तान ! घृणा से परिपूर्ण देश (फुल ऑफ़ हेट )! कुछ हमारे मित्र जो यह कहकर कि पाकिस्तानियों को छोडिये, उनसे हमें क्या लेना, उनसे पल्ला झाड़ने की बाह्यमन से कोशिश तो करते है, मगर साथ ही यह भी जानते है कि आज भी अधिकाँश पाकिस्तानियों के नाते-रिश्तेदार हमारे बीच है ! मैं उन्हें यह भी बता दूं कि ये पाकिस्तानी वाशिंदे कहीं किसी दूसरी दुनिया से टपककर नहीं आये, बल्कि हमारे ही भाईबंद है! वो भाईबंद जिनमे से अधिकाँश जैचंद के डीएनए से गर्सित, स्वार्थ और लालच के मारे और कुछ मजबूरी बस हमारी पीठ पर छुरा घोंपकर हमसे अलग हो गए ! घृणा की इनकी हद देखिये कि वे आज भी हमें अपना दुश्मन नंबर एक और अलकायदा, तालिबानियों को अपना दोस्त समझते है! लेकिन पिछले अनेक सालों से बहुत ही बुरे हालातों से गुजर रहे है! अभी तो ये हाल है कि लोग बाढ़ की वजह से कई दिनों से भूखे है, पशुओं की तरह कहीं इधर-उधर रात गुजारने को मजबूर है, बारिश में सर छुपाने को इनके लिए ख़ास कोई सार्वजनिक छत भी उपलब्ध नहीं है! हमने भी साल दो साल पहले कोसी की मार झेली थी ! इसलिए मैं यह नहीं कहूंगा कि हम लोग उनसे कोई बहुत बेहतर है किन्तु इतना जरूर कहूंगा कि हम उनसे बेहतर ढंग से अपने ही संसाधनो के जरिये इस राष्ट्रीय विपदा से निपटने में सक्षम रहे!



खैर, प्रकृति के आगे सब बेवश है, और मैं भगवान् से यही प्रार्थना करूंगा कि हे प्रभो ! पीड़ित लोगो को उनके दुखों को सहने की क्षमता प्रदान करे, उनतक जल्द-से जल्द मदद पहुचे, और वे अपने उजड़े घरों को फिर से बसा सकें ! लेकिन अब मैं इस विषय से हटकर इस लेख के शीर्षक पर संक्षेप में कुछ कहूंगा ! साथ ही यह बात मैं उन मित्रों को भी कहूंगा जो इस बात पर ऐतराज करते है कि उनके धर्म की तुलना अमरीकियों के धर्म से की जा रही है! कुछ विद्वान अपने धर्म के बारे में बड़ी- बड़ी हांकते है कि सबसे तेज धर्म है, सबसे ज्यादा धर्मावलम्बी उनके धर्म के है.... ब्लाह... ब्लाह ....! मेरा एक साधारण सा सवाल ; १४०० साल पुराना, सबसे तेज और सर्वाधिक धर्मावलम्बियों के बावजूद इनके आम इंसान की ये दुर्गति कि अलाह का पूरा आशीर्वाद होते हुए भी खुद की हिफाजत करने में अक्षम ? उसकी दी हुई भीख पर ही आखिरकार निर्भर ,जिसके समूल विनाश की दिन-रात अल्लाह से प्राथना करता है ? और उस काफिर की सद्भावना देखिये ( चाहे वह यह सब अपने फायदे की बात सोच कर ही क्यों न कर रहा हों, मगर खा तो उसी का रहे हो न ) अपनी क्या औकात है सिवाए मानव बम फोड़ने के ? Flood relief flights grounded in Pakistan
:U.S. begins flood relief missions in Pakistan . Pakistan floods affect 12 million people: Stormy weather grounded helicopters carrying emergency supplies to Pakistan's flood-ravaged northwest Friday as the worst monsoon rains in decades brought more destruction to a nation already reeling from Islamist violence.
U.S. military personnel waiting to fly Chinooks to the upper reaches of the hard-hit Swat Valley were frustrated by the storms, which dumped more rain on a region where many thousands are living in tents or crammed into public buildings.

इन अहसान फरामोशों की घृणा की हद देखिये ; यह अभागा पाकिस्तानी नागरिक , प्रेमचंद , जो उस प्लाईट संख्या २०२ में सवार था जिसके सभी १५२ यात्री इस्लामाबाद के करीब एक पहाडी पर हमेशा के लिए स्वाह हो गए ! जब इस अभागे प्रेमचंद की अर्थियां इसके परिवार को सौंपी गई तो उसके ताबूत पर लिखा था " काफिर " ! इन हरामखोरों को इतनी भी इंसानियत का ख्याल नहीं रहा, कि कम से कम एक मृतक के साथ तो अच्छा सुलूक करें, उसके ताबूत पर काफिर लिखने की बजाये उसका नाम लिख देते तो क्या इनका कुछ घिस जाता ? और उसके बाद इन कमीनो की सफाई देखिये " उसके ताबूत पर इसलिए काफिर लिखा गया ताकि कोई उसे मुस्लिम समझकर इस्लाम के हिसाब से उसका अंतिम संस्कार न करे !" उस फ्लाईट में एक और हिन्दू डाक्टर सुरेश भी सवार था, उसके कौफिन के साथ क्या सलूक हुआ, नहीं मालूम !

इस तस्वीर को देखिये , यह नहीं है कि इन्होने गलती से भारत के ध्वज को उलटा टांगा है, बल्कि सच्चाई यह है कि ये हरामखोर, अहसान फरामोश, भले इंसान भी बनना चाहते है, मगर हमारी कीमत पर ! ये भारत के ध्वज को उलटा टांग सकते है, क्योंकि हरा इस्लाम का द्योतक है, इसलिए उसे ऊपर रखना चाहते है ! ! ha-ha-ha ....!






हिन्दुस्तान में बैठे ये हमारे कुछ मुस्लिम भाईबंद हम तथाकथित उच्च जाति के हिन्दुओं को समय-समय पर यह अहसास दिलाते है कि हमारे पूर्वजों ने दलितों के साथ क्या किया ! इन्हें शायद यह अहसास कराने की जरुरत नहीं कि उस समय यह सब निर्धारण इंसान के कर्मो के हिसाब से किया जाता था ! उदाहरण के लिए, आज इनकी तार्किकता के आधार पर एक सजायाफ्ता मुजरिम, मान लीजिये कसाब ! और थोड़ी देर के लिए यह भी मान लीजिये कि कसाब की शादी हो रखी है और उसका एक बेटा भी है ! कल अगर कसाब का बेटा कहने लगे कि मेरे बाप को क्यों सजा दी गई इंसानियत के नाते, तो क्या उसके तर्क को सही मान लिया जाए ?( यह भी कहूंगा कि उसमे कुछ अपवाद भी अवश्य शामिल है ) अभी तो शिक्षित होते इंसान ने यह सब त्याग दिया है न , लेकिन क्या आपके धर्मावलम्बियों ने इसे त्यागा है ? इस अहमदिया सम्प्रदाय के इंसान की मजबूरी पर एक नजर डालिए, जिसके सगे सम्बन्धियों को अल्लाह के वन्दों ने मौत के घाट उतार दिया ;

शायद लंबा लेख हो गया, जो मैं हिन्दुस्तान के परिपेक्ष में कदापि नहीं पसंद करता ! इसलिए इसे ख़त्म करते हुए यही कहूंगा कि बजाये अपनी शक्ति को विनाश पर लगाने के इंसान के विकास पर लगाइए ! गुरूर भी उस इंसान का ही वर्दास्त किया जाता है, जो खुद में कुछ हो ! Beggars can't be a chooser !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
पाकिस्तान में अमेरिकी राहत सामग्री लेने के लिए कतार में खड़े बाढ़ पीड़ित !


नोट: इस लेख का उद्देश्य सिर्फ इतना है कि कुछ हिन्दुस्तानी सुधर जाएँ !!!!!


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15 Comments:

Blogger DR. ANWER JAMAL said...

क़ौमपरस्ती का जो अंजाम होता है उसे पाकिस्तान भी भुगत रहा है और बांग्लादेश भी। नेपाल भी सुलग रहा है और भारत में भी भूखे लोग हथियार उठाये घूम रहे हैं। लोग अपने मालिक को भुलाकर नेकी को छोड़कर शराबें पीकर नंगे नाच देख रहे हैं नंगापन फैलाने वालों को अपना आदर्श मान रहे हैं। इलाके और भाषा की बुनियाद पर नफ़रतें फैला रहे हैं। दीन-धर्म का काम है लोगों में प्यार फैलाना लेकिन हिंदू-मुस्लिम क़ौमपरस्तों ने धर्म के नाम पर भी राजनीति की है । समस्याएं हर तरफ़ हैं , भारत के हालात फिर भी ग़नीमत हैं लेकिन यहां भी ग़ल्ला सड़ा दिया जाता है और लोग भूख से मर रहे हैं। माल के पुजारियों ने बेड़ा ग़र्क़ करके रख दिया है। हर सीट पर बैठा हुआ आदमी उसे खा रहा है, भारत का हाल हम देख रहे हैं और आस-पास के देशों के बारे में आपकी नॉलिज ज़्यादा है। निकासी की राह सोची जाए तो बेहतर है। आपके जज़्बात की बहरहाल क़द्र हम पहले भी करते थे और आज भी करते हैं।

Saturday, 07 August, 2010  
Blogger सुज्ञ said...

वास्तविकता से दो चार कराती प्रस्तूति

Saturday, 07 August, 2010  
Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सार्थक लेख ....कब आँख खुलेगी ?

Saturday, 07 August, 2010  
Blogger Mahak said...

बहुत ही सार्थक,सच्चा और ज़बरदस्त लेख.........आपकी बेबाकी वाकई काबिल-ऐ-तारीफ़ है

अभी कुछ समय पहले एक खबर आई थी की अमेरिका ने अब तक हुए अनुभवों के आधार भविष्य को लेकर एक रिपोर्ट तैयार की गई है जिसमें बताया गया है की सन् 2012 तक पाकिस्तान पर पूरी तरह से जेहादियों,कट्टरपंथियों और आंतकवादियों का कब्ज़ा हो जाएगा और वो भारत और अमेरिका पर एक बहुत बड़ा हमला करेंगे जिसके परिणाम स्वरूप भारत और अमेरिका मिलकर पाकिस्तान को तहस-नहस कर्रेंगे और इसमें परमाणु हथियारों का भी इस्तेमाल होगा

इस रिपोर्ट में और भी कई predictions हैं भविष्य के बारे में

Saturday, 07 August, 2010  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

प्राकर्तिक आपदा कहीं भी आए , मरता तो आम इन्सान ही है । अभी लेह में मरने वाले भी सभी बेचारे गाँव के लोग ही थे । शुक्र है कि सभी सैलानी सुरक्षित हैं । कुछ मुट्ठी भर लोग अपने स्वार्थ के लिए सब को गुमराह करते हैं । आम जनता को इतना तो समझना ही होगा ।

Saturday, 07 August, 2010  
Blogger राज भाटिय़ा said...

अहसान फ़रामोश आम जनता तो नही है, यह काम तो नेता करते है, फ़िर हम जनता को क्यो दोष दे... हमे इन का दुख अपना दुख समझना चाहिये, यह मदद लेना भी चाहे तो पाकिस्तान के नेता वो मदद इन तक नही पहुचने देते, वहां राज नेतिक हाल बहुत खराब है लोग गुलामो सा जीवन जी रहे है...... यह बाते मेरे पाकिस्तानी दोस्त ने बताई है, लेकिन क्या करे कहां जाये यह लोग???? भुगत रहे है..... बाकी मै डॉ टी एस दराल जी की बात से सहमत हुं. धन्यवाद

Saturday, 07 August, 2010  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

ये भारत के ध्वज को उलटा टांग सकते है, क्योंकि हरा इस्लाम का द्योतक है, इसलिए उसे ऊपर रखना चाहते है ! ! ha-ha-ha ....!
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यह जान-बूझकर की गई गलती है!
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लेकिन हम मानवीय दृष्टिकोण अपनाते ही रहेंगे!

Saturday, 07 August, 2010  
Blogger शिवम् मिश्रा said...

बढ़िया आलेख !

Saturday, 07 August, 2010  
Blogger संजय @ मो सम कौन... said...

गोदियाल जी,
मरना हर जगह आम आदमी ने ही है, चाहे यहां हो या वहां। और यही तबका थोड़े से शरारती लोगों की बातों में आकर बहकता रहा है, सो कम दोष इनका भी नहीं है।
एक दुर्घटना के शिकार यात्री के ताबूत पर काफ़िर लिखने से शायद जन्नत में सीट पक्की हो जाये उनकी, और कारगिल में मरे अपने लोगों की लाशें लेने से इंकार किया था पाकिस्तानी हुक्मरानों ने। पता नहीं क्या क्राईटेरिया हैं।

Saturday, 07 August, 2010  
Blogger शरद कोकास said...

सबसे ज़्यादा ज़रूरत है मानवता के धर्म की ..बस उसी की कमी है बाकी सब धर्मों मे ।

Sunday, 08 August, 2010  
Blogger Rohit Singh said...

वो भाईबंद जिनमे से अधिकाँश जैचंद के डीएनए से गर्सित, स्वार्थ और लालच के मारे और कुछ मजबूरी बस हमारी पीठ पर छुरा घोंपकर हमसे अलग हो गए !

सही कहा है। एकदम दुरुस्त लेख .....

जिन लोगो से रिश्ते अच्छे न हो उस घर में बेटी नहीं दी जाती। पर ये कई हिंदुस्तानी लोगो के समझ में नहीं आती। अच्छी तरह से जानते हैं कि पाकिस्तान से आए लोग बम विस्फोट औऱ बांग्लादेश से गरीब बनकर आए लोग आए दिन चौरी चमारी नकली नोटो का कारोबार करते हैं. फिर भी उन लोगो को धर्म भाई करकर छुपाया जाता है। और अपने ही दोस्तों औऱ बेटों की बलि देकर इन लोगो को काफी खुशी होती है।

Sunday, 08 August, 2010  
Blogger हास्यफुहार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Sunday, 08 August, 2010  
Blogger प्रवीण said...

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आदरणीय गोदियाल जी,

बाप रे !!!
बहुत ज्यादा गुस्से में हैं आज देव,
चीयर अप प्लीज ... ;)

आभार!


...

Sunday, 08 August, 2010  
Blogger Pt. D.K. Sharma "Vatsa" said...

हकीकत से रूबरू कराता आलेख....अक्षरश: सहमति!

Sunday, 08 August, 2010  
Anonymous Anonymous said...

very nice article...
Meri Nai Kavita padne ke liye jaroor aaye..
aapke comments ke intzaar mein...

A Silent Silence : Khaamosh si ik Pyaas

Tuesday, 10 August, 2010  

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