निर्लज़्ज़ता व दम्भ़ भरी फि़जा़ देख,
कुछ यूं सा अहसास हुआ 'परचेत',
गद्दारी,अपने ही लहू मे छिपी रही होगी
वरना, किसी को तीन-तीन गुलामियां
इत्थेफाक़न ही नसीब नहीं हुआ करती ।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
चहुॅं ओर काली स्याह रात, मेघ गर्जना, झमाझम बरसात, जीने को मजबूर हैं इन्सान, पहाड़ों पर पहाड़ सी जिंदगी, फटते बादल, डरावना मंजर, कलयुग का यह ...
बिल्कुल सही कहा आपने।
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