निर्लज़्ज़ता व दम्भ़ भरी फि़जा़ देख,
कुछ यूं सा अहसास हुआ 'परचेत',
गद्दारी,अपने ही लहू मे छिपी रही होगी
वरना, किसी को तीन-तीन गुलामियां
इत्थेफाक़न ही नसीब नहीं हुआ करती ।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
पर्व रंगों का है वेरंगीन बन, बैठा हूं बातें करता खुद से, कभी न जाने क्यों ऐसा लगे, हाथ धो बैठा हूं सुध-बुध से। मदहोश-बेखबर, था तो नहीं, दर...
बिल्कुल सही कहा आपने।
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