एक सम्बोद्धन, मिया खलीफा के सगे भाइयों को...









निर्लज़्ज़ता व दम्भ़ भरी फि़जा़ देख,

कुछ यूं सा अहसास हुआ 'परचेत',

गद्दारी,अपने ही लहू मे छिपी रही होगी

वरना, किसी को  तीन-तीन गुलामियां 

इत्थेफाक़न ही नसीब नहीं हुआ करती ।

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