दुविद्या
अति सम्मोहित ख्वाब
कैफियत तलब करने
आज भी गए थे उस जगह,
जहां कल रंगविरंगे
कुसुम लेकर वसंत आया था !
जहां कल रंगविरंगे
कुसुम लेकर वसंत आया था !
ख़याल यह देख विस्मित थे
कि उन्मत्त दरख्त की ख्वाईशें,
कि उन्मत्त दरख्त की ख्वाईशें,
उम्मीद की टहनियों से
झर-झर उद्वत हुए जा रही थी,
पतझड़ पुन:दस्तक दे गया था
या फिर वसंत के पुलकित एहसास ही
क्षण-भंगूर थे, नहीं मालूम !!
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11 Comments:
मेरे मन कुछ और है, साँई के कुछ और ...
सुन्दर ..
kalamdaan.blogspot.in
दरख्त ख़्वाहिश और उम्मीद की टहनी ...बहुत सुंदर बिम्ब से सजी अच्छी रचना ॥
पतझड़ पुन: दस्तक दे गया था
या फिर वसंत के
पुलकित एहसास ही
क्षण-भंगूर थे, नहीं मालूम !!... जाने परिस्थितियाँ हावी हैं या मन की स्थिति
Lovin' it...quite romantic !...
ग्रीष्म का भय बसंत को विचलित कर रहा है..
बहुत खूब
बहुत सुन्दर उलझन !
अच्छी रचना
Behtareen rachna. Janab aap shayad bhool rahe hain ki is internet mein ek jagah log apka kaafi dino se intezaar kar rahe hain, wahan bhi tashreef laaiye!
कौन सी सोच कहाँ क्या देखती है ये तो रहस्य ही है ...
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