Tuesday, September 22, 2009

बेचारा खान !

अरे नहीं-नहीं, मै अपने वाले खानो की बात नही कर रहा, वे तो मजे मे है, और खूब ऐश कर रहे है । अपना खबरिया मीडिया भी तो आजकल सलमान खान के सारे गुनाहों को भुला, बस दिन-रात उन्ही का गुणगान करने मे लगा है। ऐसा लगता है मानो उन्हे, उनके ऊपर लगे सारे आरोपो मे क्लीन चिट मिल गई हो । यहां अपने देश मे तो किसी को अपने पाप धुलने/धुलाने हो, तो बजाये गंगा मैया की शरण में जाने के, सीधे खबरिया चैनलों का रुख करना चाहिये। हां, ये तो खैर अभी शोध का विषय है कि इस पूजन मे चढावा कितना देना पडता है ? और तो और, अगर आप गरम दिल इन्सान नही है, और पडोसी से उलझना नही चाहते, तो बस, लडने के लिये उकसाने का काम भी इन्हे सौंप दीजिये, कम से कम अपने पी एम ओ का तो यही सोचना है इनके बारे में , चीन की घुसपैठ की खबरों को लेकर ।

हां तो मै बात कर रहा था उस चोर की, जिसे हमारे पडोसी मुल्क पाकिस्तान के लोग अपना अब्बू कहते है, और कहे भी क्यों नही, उनके इसी चोर बाप ने तो उनके हाथों मे एक ऐसी दोनाली बंदूक पकडा दी, जिसकी बदौलत न सिर्फ़ वे दुनिया को धमकाते फिरते है अपितु, अपने आंका, अमेरिका से समय-समय पर ब्लैकमेल के जरिये खूब रंगदारी भी वसूलते रहते है । वैसे, कभी- कभी जब इस विषय मे सोचता हूं तो मुझे हंसी भी आती है और आश्चर्य भी होता है कि दुनियां मे शायद अमेरिका ही एक ऐसा हथियारों का दुकानदार होगा, जो पह्ले पाकिस्तान जैसे ग्राहक को खुद ही फ्री फ़ण्ड मे पैसे देता है, और फिर कहता है कि आजा बेटा, उन पैसो से मेरी दुकान से खरीददारी कर ले। साल के अन्त मे, शेयर होल्डरो के सामने एक धांसू बैलेन्स सीट पेश करने का यह भी एक नायाब तरीका है । सत्यम के राजू को और उसके आडिटर को भी इनसे सीख लेनी चाहिये थी।

जब ये जनाव बेल्जियम में परमाणु सस्थान में कार्यरत थे, मुस्लिम दुनिया का हीरो बनने के लिए इन्होने गोपनीय परमाणु दस्तावेज चुराकर अपने मुल्क पाकिस्तान ले आये. मुझे याद है की ८० और ९० के दशक में इनकी पाकिस्तान में क्या तूती बोलती थी। उस समय अगर ये किसी पाकिस्तानी जनरल से यह कहते कि इनके ही देश में इनके फलां-फलां दुश्मन के घर के ऊपर जहाज से बम गिरा दो तो पाकिस्तानी सैनिक कर्ता-धर्ता शायद वह करने से भी नहीं हिचकिचाते। ये बेचारे खान उस समय अपने को खुदा के बाद दूसरे नंबर पर समझते थे। इन्होने क्या किया, क्या नहीं किया वह तो सभी जानते है, इसलिए उस बारे में अधिक नहीं कहना चाहता। मगर जो मैं कहना चाह रहा हूँ वह यह कि यह भी सत्य है कि इंसान भले ही समझे या न समझे, उसको अपने अच्छे-बुरे कर्मो का फल यही मिल जाता है, और वही ठीक इनके साथ भी हुआ। जन्नत पाने की चाह में जो जहन्नुम ये पिछले कई सालो से भुगत रहे है, उसका खुलासा इनके द्वारा अपनी पत्नी को २००३ में लिखे गए पत्र से साफ जाहिर होता है। जिन्ना की तरह ही चंद दिनों के लिए इन्होने अपने मुस्लिम जगत की वाहवाही लूट ली हो, मगर आज कहीं ना कही अद्नर एक बहुत बड़ा जख्म छुपाये घूम रहे है।

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10 Comments:

Blogger नरेन्द्र सिंह said...

सत्यवचन !

अच्छा विश्लेषण !

Tuesday, 22 September, 2009  
Blogger Unknown said...

ख़ूब कही प्रभु !
खान पुरान का बेहतरीन सृजन किया..........हा हा हा
मज़ा आया...

Tuesday, 22 September, 2009  
Blogger विनोद कुमार पांडेय said...

badhiya prstuti aapne ki khan ji ki,hame to jaankari mili jo ham nahi janate the..so badhayi aapko!!

Tuesday, 22 September, 2009  
Blogger नीरज गोस्वामी said...

सटीक बात ..
नीरज

Tuesday, 22 September, 2009  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

SACH KAHA ...... AISE LOGON KA AISA HI HASHR HOTA HAI .......... ACHHA LIKHA HAI ...

Tuesday, 22 September, 2009  
Blogger राज भाटिय़ा said...

आप ने बिलकुल सही लिखा, जब यह नीदर लेण्ड (हॊलेंड )से फ़ार्मुला ले कर भागा तो उस के बाद अब पाकिस्तानी मुसलमानो को युरोप मै किसी भी महत्ब पुरण जगह पर नही रखा जाता,
धन्यवाद

Tuesday, 22 September, 2009  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

"......कि यह भी सत्य है कि इंसान भले ही समझे या न समझे, उसको अपने अच्छे-बुरे कर्मो का फल यही मिल जाता है, ......"

"बेचारा खान!"
पोस्ट बहुत प्रेरक रही।
बधाई!

Tuesday, 22 September, 2009  
Blogger kishore ghildiyal said...

lachar khan ki satik katha

Tuesday, 22 September, 2009  
Blogger देवेन्द्र पाण्डेय said...

वाह!

Tuesday, 22 September, 2009  
Blogger Pt. D.K. Sharma "Vatsa" said...

कमाल है! इतना बढिया "खान पुराण" बाँचा जा रहा है और अभी तक इस पोस्ट पर किसी खान साहब के दर्शन नहीं हुए:)))

Wednesday, 23 September, 2009  

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