Wednesday, October 14, 2009

इल्तजा



दगा  दिल से किसी के
मत कर , ऐ यार,
सलवटों में ही दबकर 
न रह जाए प्यार। 

निश्छल मन 
न छल चेहरे पर,
यूं हो किसी से, 
मुहब्बत का  इजहार।  

घर के द्वारे आये,
झुकी पलकें, मुस्कुराये, 
तभी चाँद का 
तू कर  दीदार।  

कदर फूल की ,
फिर  मोल-भाव क्यों ?
गुल-ऐ-गुलशन 
मत कर जीना दुश्वार।  

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8 Comments:

Blogger अजय कुमार said...

फ़ुर्सत के उन हसीं लमहो में,
जीना दुष्वार मत करना
kya baat hai

Wednesday, 14 October, 2009  
Blogger अर्कजेश Arkjesh said...

मन निश्छल न हो,
छल चहरे पे नजर आये !
इस तरह के प्यार का ,
तुम इजहार मत करना !!

बहुत बढिया !

Wednesday, 14 October, 2009  
Blogger राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर कविता.
धन्यवाद
आप को ओर आप के परिवार को दीपावली की शुभ कामनायें

Wednesday, 14 October, 2009  
Blogger M VERMA said...

सलवटों में दबके रह जाए,
वह प्यार मत करना !!
बहुत भावमय रचना और खूबसूरत एहसास

Wednesday, 14 October, 2009  
Blogger Udan Tashtari said...

वाह!! बहुत खूब!

Wednesday, 14 October, 2009  
Blogger डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

फूलो को तेरे कदरदान,
खरीदने पर उतर आयें !
गुल-ऐ-गुलशन को यों ,
सरेआम बाजार मत करना !!!!

wah! bahut khoob..........

bada achcha laga padh kar..........

Wednesday, 14 October, 2009  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

गफलतों में भी दगा दिल से,
ऐ यार मत करना !
सलवटों में दबके रह जाए,
वह प्यार मत करना !!

वाह क्या बात है....
बहुत बढ़िया लिखा है।
धनतेरस, दीपावली और भइया-दूज पर
आपको ढेरों शुभकामनाएँ!

Wednesday, 14 October, 2009  
Anonymous Anonymous said...

वाह, क्या बात है... आपका ऐसा मिजाज़ तो शायद पहली बार देख रहा हूँ... बहुत सुन्दर ..

Wednesday, 14 October, 2009  

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