इल्तजा
दगा दिल से किसी के
मत कर , ऐ यार,
सलवटों में ही दबकर
न रह जाए प्यार।
निश्छल मन
न छल चेहरे पर,
यूं हो किसी से,
मुहब्बत का इजहार।
घर के द्वारे आये,
झुकी पलकें, मुस्कुराये,
तभी चाँद का
तू कर दीदार।
कदर फूल की ,
फिर मोल-भाव क्यों ?
गुल-ऐ-गुलशन
मत कर जीना दुश्वार।
मत कर , ऐ यार,
सलवटों में ही दबकर
न रह जाए प्यार।
निश्छल मन
न छल चेहरे पर,
यूं हो किसी से,
मुहब्बत का इजहार।
घर के द्वारे आये,
झुकी पलकें, मुस्कुराये,
तभी चाँद का
तू कर दीदार।
कदर फूल की ,
फिर मोल-भाव क्यों ?
गुल-ऐ-गुलशन
मत कर जीना दुश्वार।
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8 Comments:
फ़ुर्सत के उन हसीं लमहो में,
जीना दुष्वार मत करना
kya baat hai
मन निश्छल न हो,
छल चहरे पे नजर आये !
इस तरह के प्यार का ,
तुम इजहार मत करना !!
बहुत बढिया !
बहुत ही सुंदर कविता.
धन्यवाद
आप को ओर आप के परिवार को दीपावली की शुभ कामनायें
सलवटों में दबके रह जाए,
वह प्यार मत करना !!
बहुत भावमय रचना और खूबसूरत एहसास
वाह!! बहुत खूब!
फूलो को तेरे कदरदान,
खरीदने पर उतर आयें !
गुल-ऐ-गुलशन को यों ,
सरेआम बाजार मत करना !!!!
wah! bahut khoob..........
bada achcha laga padh kar..........
गफलतों में भी दगा दिल से,
ऐ यार मत करना !
सलवटों में दबके रह जाए,
वह प्यार मत करना !!
वाह क्या बात है....
बहुत बढ़िया लिखा है।
धनतेरस, दीपावली और भइया-दूज पर
आपको ढेरों शुभकामनाएँ!
वाह, क्या बात है... आपका ऐसा मिजाज़ तो शायद पहली बार देख रहा हूँ... बहुत सुन्दर ..
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