Monday, February 1, 2010

हे कृष्ण ! तुम्हारा क्या पक्ष है ?

आज तो सवालों के घेरे में घिरा, स्वयं यक्ष है,
पक्षपातियों के चंगुल में फंस चुका,निष्पक्ष है।

दर-दर की ठोकरें खाता, ईमान का सुत दीन है,
शठ का बेटा कपट, भ्रष्टता में हुए जा रहा दक्ष है।

धुर्तों के कक्ष में तो हर शाम मनती है दीवाली,
वीरान-सुनशान सा पडा हरीशचंद्र का कक्ष है।

चोर-उचक्के, लुच्चे-लफंगे, गद्दी पे काबिज हो गए,
और कौए जहां मूंग दल रहे, वो हंस का वक्ष है।  

कृष्ण भी भूल गए शायद, 'यदा-यदा ही धर्मस्य',
 बीज बोया था जैंसा,फल भी वैसा हमारे समक्ष है।    

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14 Comments:

Blogger vikas mehta said...

आज यहाँ खुद ही, सवालों में घिरा यक्ष है,
अपने ही घर से बेघर, हो गया निष्पक्ष है !

aapki pahli lain sabse achhi lgi vaise sabhi achhi hai lekin yah lain mujhe sabse achhi lgi
धूर्त का घर हर रोज, मना रहा है दीवाली,
वीरान-सुनशान पडा, हरीशचंद्र का कक्ष है !

Monday, 01 February, 2010  
Blogger स्वप्न मञ्जूषा said...

आज यहाँ खुद ही, सवालों में घिरा यक्ष है,
अपने ही घर से बेघर, हो गया निष्पक्ष है !
bahut badhiya likha hai Godiyal sahab,
Behtareen lagi ye rachna aapki..

Monday, 01 February, 2010  
Blogger Unknown said...

"चोर-उचक्के, लुच्चे-लफंगे, गद्दी पर काबिज हुए,
कौवा मूंग दल रहा यहाँ, हंस के वक्ष है!!"

सत्य को प्रतिपादित करती हुईं पंक्तियाँ!

Monday, 01 February, 2010  
Blogger वाणी गीत said...

सवालों में उलझा ही गयी कविता .....!!

Monday, 01 February, 2010  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

हे कृष्ण, भूल गए तुम, यदा-यदा ही धर्मस्य..
गोदियाल पूछता है तुम्हे, तुम्हारा क्या लक्ष है ??

हमारा भी यही सवाल है।

Monday, 01 February, 2010  
Blogger मनोज कुमार said...

कवि का कृष्ण से साक्षात्कार दिलचस्प है।

Monday, 01 February, 2010  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

ईमान का बेटा दीन, दर-दर भटक रहा है,
शठ का बेटा कपट, भ्रष्टता में हुआ दक्ष है !!

ठीक ही तो है,
जैसा बेटा वैसा बाप!

Monday, 01 February, 2010  
Blogger KAMDARSHEE said...

This comment has been removed by a blog administrator.

Monday, 01 February, 2010  
Blogger KAMDARSHEE said...

This comment has been removed by a blog administrator.

Monday, 01 February, 2010  
Blogger ताऊ रामपुरिया said...

लाजवाब.

रामराम.

Monday, 01 February, 2010  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

हे कृष्ण, भूल गए तुम, यदा-यदा ही धर्मस्य..
गोदियाल पूछता है तुम्हे, तुम्हारा क्या लक्ष है ??

गोदियाल साहब ............ सही प्रश्न किया है आपने .......... पूरी कविता ही अपने आप से प्रश्न करती हुई है ....... बहुत खूब

Tuesday, 02 February, 2010  
Blogger अजय कुमार said...

क्या बात है ,पहले तो आज के हालात को दर्शा दिया और अंत में एक अनुत्तरित प्रश्न । अच्छी रचना , बधाई

Tuesday, 02 February, 2010  
Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सही प्रश्न उठाये हैं....समसामयिक रचना..

Tuesday, 02 February, 2010  
Blogger संजय भास्‍कर said...

गोदियाल साहब ............ सही प्रश्न किया है आपने .

Tuesday, 30 March, 2010  

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