Friday, June 26, 2020

संयुक्त

लक्ष्मण रेखा, हमने नहीं, उसने लांघी है
ऐ पार्थ, मत छोडना तुम उस कमीन को,
क्योंकि तुम ही रखवाले हो, इस युग के,
आ़ंच आने न पाए, मातृभूमि जमीन को।

दौलत का निहायत ही भूखा है, हरामी,
कुटिल बातों मे उसकी कभी हरगिज भी,
डगमगाने न देना तुम, अपने यकीन को,
वक्त आने पे छोडना मत, कुटिल चीन को।

3 Comments:

Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर।
यही वक्त का तकाजा है।

Saturday, 27 June, 2020  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

आभार, आपका🙏

Saturday, 27 June, 2020  
Blogger Kavi said...

बहुत ही सुंदर लिखा है आप मेरी रचना भी पढना

Wednesday, 05 August, 2020  

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