Tuesday, December 23, 2025

ऐ धोबी के कुत्ते!

सुन, प्यार क्या है,

तेरी समझ में न आए तो,

अपने ही प्यारेलाल को काट खा,

किंतु, ऐ धोबी के कुत्ते!

औकात में रहना, ऐसा न हो,

न तू घर का रहे, न घाट का।


1 Comments:

Blogger Admin said...

आपकी कविता सीधे गले पकड़ लेती है और छोड़ती नहीं। आपने प्यार, गुस्सा और चेतावनी को एक साथ रख दिया। भाषा कड़वी है, मगर बात सच्ची लगती है। मुझे इसमें सड़क की बोली और जीवन का अनुभव दिखता है। यह रचना किसी को खुश करने नहीं, झकझोरने आई है।

Wednesday, 21 January, 2026  

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