नादानी
पता नहीं किसको ढूंढते रहे थे हम,
सबसे पूछा, डाकिया,धोबी,खलासी,
सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े,
लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,
उम्र गुजरी,तबअहसास हुआ 'परचेत',
जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
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