Wednesday, January 14, 2009

अनिष्ट से आशंकित एक कली !


सूबे-मुल्क की राजधानी में 
हुमायु के मकबरे के पास,
माली के छोटे से उपवन में
बैठी थी एक कली उदास !

कली खिलकर किसी भी पल
फूल बनने के कगार पर खड़ी थी,
भवितव्यता चिंता की लकीरें
 
तमाम उसके माथे पर पडी थी !

पूछा जो उलझन का सबब,
वो बोली  भाव-विभोरकर,
मुझे बलि चढ़ाया जाएगा
संभवतया अगली भोर पर !


मृत्यु-शय्या पर है शठ नेता, 
कुटिल जुट रहे उसकी गेह पर,
मैं गिरना नहीं चाहती मगर
 भ्रष्ट सियासतदानों की देह पर !


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3 Comments:

Anonymous योगेन्द्र मौदगिल said...

अच्छी कविता है भाई... बधाई स्वीकारें...

Friday, 16 January, 2009  
Anonymous पी.सी.गोदियाल said...

Dhanyvaad, Yogender ji

Friday, 16 January, 2009  
Anonymous राजीव करूणानिधि said...

बहुत अच्छी कविता लिखते हैं आप. गलतियों पर ध्यान नही दें, बस रचना सुन्दर होनी चाहिए. बधाई आपको.

Saturday, 17 January, 2009  

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