Wednesday, March 20, 2013

"ये कैदे बामशक्कत, जो तूने की अता है"



  
बसर हो रही कहाँ,कैसे,तुझको सब पता है,
ये कैदे बामशक्कत, जो  तूने की  अता है।  

माना कि दूर बहुत है, मगर अंजान नहीं तू,
देख सब कुछ रहा,सिर्फ नजरों से लापता है। 

हथिया लिया यहाँ पे, ठग,चोरों ने सिंहासन,
कुछ पर केस चल रहा, कुछ सजायाफ्ता हैं। 
   
नारी की अस्मिता यहाँ,खतरे से खाली नहीं, 
दरिन्दे दिखा रहे सरेराह,क़ानून को धता है। 

पता नहीं क्या हुआ, आदमी को इस देश के,
गद्दार,नमकहराम फल-फूल रहे अलबता हैं।   

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7 Comments:

Blogger रविकर said...

बहुत बढ़िया आदरणीय-
शुभकामनायें-

Wednesday, 20 March, 2013  
Blogger ताऊ रामपुरिया said...

वाह वाह बहुत ही लाजवाब.

रामराम.

Wednesday, 20 March, 2013  
Blogger पूरण खण्डेलवाल said...

अच्छी गजल !!

Wednesday, 20 March, 2013  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

हथिया लिया यहाँ पे, ठग,चोरों ने सिंहासन,
कुछ पर केस चल रहा, कुछ सजायाफ्ता हैं। ...

सच कहा है गौदियाल जी ... ये सिंहासन तो कब से हथियाया हुवा है ऐसे लोगों ने ...

Wednesday, 20 March, 2013  
Blogger अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

माना कि दूर बहुत है, मगर अंजान नहीं है,
देख सब रहा तू, सिर्फ नजरों से लापता है।

उम्दा गज़ल.........

Wednesday, 20 March, 2013  
Blogger भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत ही बढ़िया..

Thursday, 21 March, 2013  
Blogger शारदा अरोरा said...

hame to achchhi lagi gazal...

Thursday, 21 March, 2013  

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