Wednesday, November 17, 2021

गूढ़ सत्य






अपने तमाम एहसास हमने, 

कुछ यूं लफ्जो़ मे पिरोए हैं,

तुम साथ तो चेहरे पे मुस्कुराहट बिखेरी,

और अकेले मे रोए हैं।




6 Comments:

Blogger अनीता सैनी said...

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरुवार(१८-११-२०२१) को
' भगवान थे !'(चर्चा अंक-४२५२)
पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर

Wednesday, 17 November, 2021  
Blogger मन की वीणा said...

उम्दा, हृदय स्पर्शी!

Thursday, 18 November, 2021  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

आभार, आपका🙏

Thursday, 18 November, 2021  
Blogger सुशील कुमार जोशी said...

लाजवाब

Thursday, 18 November, 2021  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

Thanks, Sir ji.

Thursday, 18 November, 2021  
Blogger Admin said...

आपने बहुत कम शब्दों में गहरी बात कह दी। मैं पढ़ते ही उस एहसास से जुड़ गया। हम सब कभी न कभी यही करते हैं, सामने मुस्कुरा लेते हैं और अकेले में टूट जाते हैं। मुझे आपकी सादगी पसंद आई, क्योंकि आपने दर्द को सजाया नहीं, सीधे रखा।

Tuesday, 17 February, 2026  

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home