ऐ जिंदगी...
ऐ जिंदगी,
तू मेरे घर मत आना...
अकेला ही रहता हूँ,
हर गम अकेले ही सहता हूँ,
दिनभर दौड-धूप का मारा,
दुनियांं से थका हारा,
साफ-सफाई का मोहताज.....
पसंद नहीं आएगा तुझको,
ये मेरा कबाड़खाना।
ऐ जिंदगी,
तू मेरे घर मत आना...
यही काफी है मेरे लिए
कि मैं तुझसे प्यार करता हूँ,
हर गम-ओ-खुशी
तेरे दरमियाँ से गुजरता हूँ,
मगर रूठे जो तू कभी...
तो फिर मनाने को ,
दे न पाऊंगा तुझको
मैं दिल का कोई नज़राना ।
ऐ जिंदगी,
तू मेरे घर मत आना...
13 Comments:
अकेले रहने की व्यथा उभर कर आई है । भावपूर्ण रचना ।
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 04.03.2021 को <a href="https://charchamanch.blogspot.com/2021/03/3995.html”> चर्चा मंच </a> पर दिया जाएगा| आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
धन्यवाद
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 04.03.2021 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा| आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
धन्यवाद
'दी', आपका आभार।🙏
शुक्रिया, विर्क सहाब।
सुन्दर सृजन
बहुत सुंदर सृजन।
सादर
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
बहुत सुंदर सृजन।
अकेलापन.....!
आंतरिक पीड़ा को उजागर करती
बहुत सुंदर रचना
वाह
आग्रह है मेरे ब्लॉग को भी फॉलो करें
आभार
आभार, आप सभी का🙏
बहुत सुन्दर,बेहतरीन भाव!
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