Friday, February 12, 2021

असमंजस

प्रश्न विकट है, समय निकट है,

देह-ईमान किधर दफना़ऊ? 

चहूंओर, गिद्ध हैं, गीदड़ हैं। 

डाल-डाल से, ताल-ताल से,

हैं नज़र गढा़ए निष्ठा-भक्षी, 

शठ,लुच्चे-लफंगे, लीचड़ हैं। 

गजब येह भंवरधारा,'परचेत',

कुटिल, कपटमय कीचड़ हैं,

पतितता के आकंठ मे डूबे, 

जहां भ्रष्टाचार के बीहड़ हैं।।

4 Comments:

Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर और सटीक।

Friday, 12 February, 2021  
Blogger Dr Varsha Singh said...

यथार्थवादी विचारोत्तेजक गीत... बधाई

Saturday, 13 February, 2021  
Blogger Rohitas Ghorela said...

ये बीहड़ कब कटे
देखो।
सुंदर रचना

Saturday, 13 February, 2021  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

आभार, आप सभी का🙏

Saturday, 13 February, 2021  

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