Tuesday, January 26, 2021

गणतंत्रपर्व का हर्ष और विसाथद..

वैरियों से जुडे हों जिनके तार ऐसे,

कृषक भेष मे लुंठक, बटमार ऐसे,

कापुरुष किसान परेड की आड मे,

कर रहे है, देश-छवि शर्मशार ऐसे।


इधर ये, वीरों के शौर्य को सलाम करके 

लोग करते गणतंत्र पर्व को साकार ऐसे ,

उधर वो, लालकिले को  रौंदने मे लगे हैं,

कुछ फसादी, तुच्छ-स्वार्थी मक्कार ऐसे।


नेताओं की महत्वाकांक्षा ने कर रखा

सम्पूर्ण व्यवस्था के तंत्र को लाचार ऐसे,

कापुरुष किसान परेड की आड मे,

कर रहे है, वतन-छवि शर्मशार ऐसे।


सभी ब्लॉग मित्रों  को  गणतंत्र दिवस की 

हार्दिक शुभकामनाएं।🙏










5 Comments:

Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (27-01-2021) को  "गणतंत्रपर्व का हर्ष और विषाद" (चर्चा अंक-3959)   पर भी होगी। 
-- 
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
-- 
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
सादर...! 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
--

Wednesday, 27 January, 2021  
Blogger मन की वीणा said...

त्वरित सृजन सामायिक सुंदर।

Wednesday, 27 January, 2021  
Blogger नूपुरं noopuram said...

मन की अपार पीड़ा को आपने शब्दों में उंडेल दिया.धन्यवाद.
कल के शर्मनाक घटनाक्रम से अब तक स्तब्ध है जन मानस.

Wednesday, 27 January, 2021  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

आभार, आप सभी का🙏

Wednesday, 27 January, 2021  
Blogger जिज्ञासा सिंह said...

बहुत सुन्दर समसामयिक रचना सटीक प्रश्न उठाती हुई..

Thursday, 28 January, 2021  

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home