यह कविता मुझे दोस्त की तरह कंधे पकड़कर समझाती हुई लगती है। आप वर्तमान की कीमत साफ शब्दों में बताते हैं। आप भविष्य बेचने वालों और सड़कछाप नेताओं दोनों से दूरी रखने की बात सीधे कहते हैं। मुझे इसकी बेबाकी पसंद आती है।
ऐसा कुछ भी ख़ास है नहीं बताने को, अपने बारे में ! बस, यों समझ लीजिये कि गुमनामी के अंधेरो में ही आधी से अधिक उम्र गुजार दी !हाँ, अपनी बात कुछ भगत सिंह जी के अंदाज में इस तरह कहूंगा ;
इन बिगड़े दिमागों में, ख्वाबों के कुछ लच्छे हैं,
हमें पागल ही रहने दो, हम पागल ही अच्छे हैं।
साभार,
गोदियाल
My humble request is to kindly ignore the typographical errors.
My fondest wish is to inspire someone else to write something even better than I have done.
Look forward to receiving your creative suggestions.
regards,
Godiyal
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
4 Comments:
यह कविता मुझे दोस्त की तरह कंधे पकड़कर समझाती हुई लगती है। आप वर्तमान की कीमत साफ शब्दों में बताते हैं। आप भविष्य बेचने वालों और सड़कछाप नेताओं दोनों से दूरी रखने की बात सीधे कहते हैं। मुझे इसकी बेबाकी पसंद आती है।
भविष्यवेत्ता | सही |
🙏🙏
🙏🙏
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home