बहुरूपिये!
अब कहूं भी कैंसे कि तू हिसाब-ए-मुहब्बत,
किस तरह मुझसे गिन-गिन के लेती थी,
रहती तो हमेशा नज़रों के सामने थी, मगर
जमाने के आगे कुछ कम ही दिखाई देती थी।
...............नमस्कार, जय हिंद !....... मेरी कहानियां, कविताएं,कार्टून गजल एवं समसामयिक लेख !
2 Comments:
रूपिए जुड़ा है न इसीलिए :)
🤣🤣
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