Thursday, April 9, 2026

बंदिशें अपनी।


रातें अक्सर ही मुझसे सवाल किया करती हैं, 

और एक मैं हूं कि उनका जबाब ही नहीं देता,

कभी नयन थकते थे, अब कदम थकनें लगे हैं,

और कितना चल पाऊंगा, मैं हिसाब ही नहीं देता।


जज़्बात ऐसे लगने लगे हैं  मानो ये जज़्बाती नहीं,

जमाने की हसरतें और आदतें हैं जो जाती नहीं,

अधजगी नीदं मे जुबां लगे है कुछ पढने को आतुर,

और मैं हूं कि उसे पढ़ने को किताब ही नहीं देता।



अनियमित नींदचर्या, स्लीपिंग डिसआर्डर कह लो,

दर्द की कोई सीमा नहीं जितना सह सको, सह लो,

डगमगाते कदम कहते हैं कि बहक जाने दो हमें भी,

मगर 'परचेत' मौका-ए-बहकना ख्वाब ही नहीं देता।













3 Comments:

Blogger Admin said...

यार, ये पंक्तियाँ सच में दिल के अंदर तक उतर जाती हैं। आपने रातों की बेचैनी और अंदर चल रही खामोशी को बहुत सच्चाई से पकड़ा है। मुझे खासकर वो लाइन लगी, जहाँ कदमों की थकान की बात आती है, क्योंकि वो सिर्फ शरीर नहीं, मन की थकान भी दिखाती है।

Friday, 10 April, 2026  
Blogger पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

🙏🙏

Friday, 10 April, 2026  
Blogger सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर

Sunday, 12 April, 2026  

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