Wednesday, June 20, 2012

भागीरथ के पुरखे तर ही जायेंगे, इसकी क्या गारंटी है ?


कहाँ से शुरू किया जाये, इसी उहापोह में काफी वक्त जाया कर गया सन् अस्सी के दशक की बात है, कॉलेज के दिनों में जब तत्कालीन वितमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी द्वारा पेश केन्द्रीय वार्षिक बजट का भिन्न-भिन्न विशेषज्ञों द्वारा किये गए विश्लेषण को किसी पत्रिका में पढ़ रहा था, और वहाँ लिखी प्रतिक्रिया में व्यक्त की गई चंद बातें, जिसमे कहा गया था कि पूर्वी राज्य और उत्तर के पर्वतीय इलाके जिनकी अपनी तो कोई ख़ास आय है नहीं, के लिए केंद्र को अपनी आय में से खर्च की एक बड़ी मद इनके लिए आरक्षित रखनी पड़ती है, दिल  को भेदती सी निकल गई थी। आहत युवा-मन बस यही सोचता रह गया था कि ऐ काश, हमारा क्षेत्र भी आर्थिक रूप से एक साधन-संपन्न क्षेत्र होता तो शायद वह बात इतनी न अखरती। और फिर तब शुरू होते थे मन के ख्याली पुलाव   काल्पनिक  दुनिया  में गोते     लगाता  युवा-मन सोचता कि अगर  मैं एक वैज्ञानिक किस्म का बलशाली और रसूकदार इंसान होता तो अपने पहाड़ों से निकलने वाली सारी नदियों को बाँध के जरिये वहीं पहाड़ों में ही रोककर, और फिर अत्याधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल कर उसको हाइड्रोजन में तब्दील कर अणु-परमाणुओं की तरह  गोलों में इस तरह भरता कि फिर जब जरुरत हो तो उसे पानी में तब्दील करके इस्तेमाल किया जा सके एक गोले में इतने पर्याप्त पानी को हाइड्रोजन में तब्दील करके संग्रहित किया जा सके कि मैदानी भू-भाग के एक किसान के लिए एक ही गोला उसकी सिंचाई जरूरतों के लिए काफी हो और फिर ऋषिकेश में एक बड़ी दूकान खोलकर, किसी धन्ना सेठ की तरह पसरकर बैठता, और उन गोलों को बाकी देश, सरकार और विदेशों को निर्यात करता। उस माल को खरीदने वालों की कतार लगी रहती, माल ऑर्डर पर तैयार किये जाते और फिर उस आय से पूरे उत्तराखंड को मालामाल बना देता। जो सरप्लस स्टाक बचता उसे हवाई मार्ग से सीधे बंगाल की खाड़ी में उतारने की व्यवस्था होती फिर कोई यह कहने की जुर्रत न करता कि राष्ट्रीय आय में इन इलाकों की अपनी कोई ख़ास भागेदारी नहीं है  

खैर, यह तो थी तब की एक आक्रोशित युवा-मन की लम्बी काल्पनिक उडान। मगर यथार्थ में सच्चाई यह है कि अपने इन पहाड़ों में पिछले तीस सालों की मशक्कत के बाद जो चंद बाँध खड़े किये भी गए थे, उनकी भी हवा निकलनी शुरू हो गई है। अफ़सोस इस बात का है कि इन्हें रोकने के तर्क और वजहें वैज्ञानिक आधार पर कम और आस्था के आधार पर अधिक दी  जा रही हैं। हालांकि जहां तक पर्यावरण संरक्षण का सवाल है, मैं भी इस बात का पुरजोर समर्थक हूँ कि जरुरत के मुताविक प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल करते वक्त हमें हर हाल में अपने पर्यावरण को अपने लिए और भविष्य के लिए संरक्षित और सुरक्षित रखना है मगर क्या हकीकत में ऐसा हो रहा है ? क्या इसके प्रति हम और हमारी सरकारें वाकई गंभीर है ? इसे संरक्षित और सुरक्षित रखने का ठेका किसकी कीमत पर? क्या इसके संरक्षण हेतु उठाये जा रहे कदम ईमानदारी से उचित समय पर उठाये गए है और क्या वाकई मानव हित में है ? ये वो कुछ सवाल है जो आज हमारे समक्ष मुंह बाए खड़े है   

मेरे अपने अध्ययन के हिसाब से इन परियोजनाओं का विरोध करने वाले आज दो तरह के लोग मैदान में है। एक वो लोग है जिनमे से अधिकाँश को दुनियादारी से कुछ लेना-देना ही नहीं है। ये लोग हर हाल में गंगा की अविरल धार को बहते देखना चाहते है। मगर ये लोग भूल जाते है कि गंगा की जिस निर्मल-अविरल धार की ये बात कर रहे है, क्या उसे ये सिर्फ पहाड़ों में ही देखना चाहते है ? मैदानी क्षेत्रों में बहती उस गंगा का क्या हश्र है, क्या इन्हें मालूम नहीं ? और जिन पहाड़ों में ये गंगा की निर्मल धार की ये वकालात करते है, उसे सबसे ज्यादा प्रदूषित यही लोग करते है। यात्रा सीजन में खासकर सुबह के वक्त एक-दो नहीं हजारों की तादाद में कतार में इन साधू-महात्माओं को देख लीजिये कि वहीं ये नदी किनारे स्नान कर करे है और वहीं शौच ! क्या तब इन्हें उस गंगा की निर्मलता का ख्याल नहीं आता, जब इनके अपने खुद के पिछवाड़े आग लगती है? 

दूसरे वे संभ्रांत, शिक्षित लोग है, जिनमे से ज्यादातर ने उत्तराखंड देखा ही नहीं। जिन्हें यह नहीं मालूम कि  चुल्हा जलाने के लिए जब घर में माचिस की डिबिया ख़त्म हो जाती है तो एक पहाडी को सिर्फ एक नई माचिस की डिब्बी खरीदने हेतु कई-कई किलोमीटर की पैदल  चढ़ाई-उतार तय करके दूकान तक पहुंचना होता है  इन  बुद्धिजीवियों द्वारा तर्क दिए जाते है कि इससे गंगा के मैदानों में कृषि प्रभावित होगी, इससे गंगा की धार सूख जाएगी, इससे पहाड़ों की प्राकृतिक खूबसूरती को नुकशान पहुंचेगा...  इत्यादि...इत्यादि !   मैं भी यह अच्छी तरह से जानता हूँ कि इससे प्राकृतिक बहाव और प्राकृतिक खूबसूरती पर अवश्य कुछ फर्क पडेगा, किन्तु जिन पहाड़ियों के समक्ष भूख का सवाल खडा हो वे क्या इन बातों की परवाह करेंगे? अक्सर यह भय दिखाया जाता है कि इससे भूकंप आयेंगे और ये बांध टूट जायेंगे, तो उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सुरक्षित तो परमाणु सयंत्र भी नहीं है और इंसान को आखिरकार बिजली तो चाहिए ही उसके वगैर तो आज गुजारा ही नहीं। वैसे भी ये जल-बिजली सयंत्र प्रकृति की अनदेखी करके नहीं लगाए जाते है। हर परियोजना  सभी पहलुओं जिनमे पर्यावर्णीय पहलू भी शामिल है के उचित अध्धयन के बाद ही मंजूर की जाती है। रही बात गंगा के बहाव में कमी की, तो  यदि हर चीज तरीके से इस्तेमाल की जाए तो नुकशान कम और फायदे ज्यादा है। पहाडी नदियों में पानी के मात्रा सिर्फ नवम्बर से फरवरी-मार्च तक कम रहती है। सरकार अगर यह क़ानून पारित कर दे कि इन चार महीनो  में सिर्फ एक सीमित मात्रा में ही विद्युत उत्पादन होगा और एक निश्चित पानी की मात्रा नदियों में छोडनी ही पड़ेगी तो धारा और बहाव कम होने की बजाये उचित स्तर पर बनाए रखे जा सकते है। इसी तरह बरसात में इन बांधों की झीले मैदानी भागों में आने वाले बाढो को नियंत्रित करेंगी। हाँ, एक ही नदी पर एक निश्चित मात्रा से अधिक बाँध बंनाने पर रोक लगाई  जानी जरूरी है
A view of Srinagar (Garhwal) Dam Project site

अब जो लोग पर्यावरण के नुकशान की बात करते है वे ज़रा इस परियोजना पर नजर डाले; यह है श्रीनगर (गढ़वाल) जलविद्युत परियोजना। इस परियोजना को भी हाल ही में उत्तराखंड में चल रही  अन्य परियोजनाओं की तरह विराम लगा दिया गया। इससे इसमें कार्यरत कंपनियों में काम कर रहे स्थानीय ६५० से अधिक लोग तत्काल बेरोजगार हो गए। बात इतनी सी ही नहीं है, अब तक सिर्फ इसी परियोजना पर अरबों रुपये खर्च हो चुके है, उसका भार किस पर पडा ?  और यदि इसे बीच में ही रोकना था तो शुरू ही क्यों किया गया था ? ऊपर  के चित्र को गौर से देखिये ; (चित्र को बड़ा देखने हेतु कृपया उस पर किल्क करें ) ये जो बीच नदी में कंक्रीट के बड़े- बड़े पिलर खड़े कर दिए गए है, और नदी को सुरंग में डाला गया है।  बरसात में इस नदी में चीड-देवदार के पूरे-पूरे पेड़ बहकर आते है, अन्य जंगली घास-पेड़ों का मालवा भी बहकर आता है, वह  जब यहाँ आकर इकठ्ठा होगा तो क्या होगा किसी ने सोचा ?

सरकार और राजनेताओं के बिना सोचे-समझे लिए गए अविवेकपूर्ण निर्णय आखिरकार इस खस्ताहाल देश पर ही भारी पड़ेंगे, इसकी अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ेंगे  एक तरफ इन्होने इन परियोजनाओं को ठप्प कर दिया और दूसरी तरफ नई परियोजना के लिए चमोली गढ़वाल में भूमि अधिग्रहित करने में जुटे है जिसका स्थानीय जनता पुरजोर विरोध भी कर रही है  इन सत्तासीन लोगों ने तो इनसे अपने स्वार्थों की सिद्धि पहले ही कर ली है, इसलिए इनपर कोई फर्क नहीं पड़ता,  भुगतना तो हर हाल में आम जनता को ही है। बड़े बाँध यदि असुरक्षित थे तो जितना धन उन पर लगाया गया, उतना वहाँ की छोटी बड़ी सेकड़ों नदियों पर छोटे-छोटे बाँध बनाकर छोटी पनविध्युत परियोजनाए और सिंचाई के साधनों में वृदि करके वहा के जीवन स्तर को और तमाम देश के स्तर को सुधारा जा सकता था     रही बात आस्था की तो भैया,  गंगा मैया जब स्वर्ग से निकली थी तो उनका पहला सामना तो शिवजी की जटा रूपी बाँध से ही हो गया था         

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11 Comments:

Blogger प्रतिभा सक्सेना said...

बहुत सही बातें कही हैं आपने ,पर्वत कितना देते हैं ,उन्हें रक्षित करना और उनका स्वाभिमान बनाये रखना व्यवस्था चलानेवालों का काम है.

Wednesday, 20 June, 2012  
Blogger ANULATA RAJ NAIR said...

अच्छा आलेख....
पर्यावरण की जागरूकता आते आते देर कर रही है शायद... और इस राजनीति से प्रकृति को कैसे बचाएं हम???

सादर.

अनु

Wednesday, 20 June, 2012  
Blogger Shah Nawaz said...

Yaqinan gambheer chintan ka vishay hai....

Wednesday, 20 June, 2012  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

जल, जंगल और जमीन की चिन्ता ही किसको है।
सब अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने में लगे हैं।

Thursday, 21 June, 2012  
Blogger Smart Indian said...

आपकी चिंता वाजिब है। कोई भी परियोजना शुरू करने से पहले सभी प्रभावित समुदायों को साथ लेकर योजना के सभी पक्षों और प्रभावों पर गहन चिंतन होना चाहिये और सब कुछ तय हो जाने पर उसका निष्पादन अच्छी तरह और जल्दी होना चाहिये। छोटी मोटी समस्यायें आने पर उनका समुचित निराकरण भी हो। हमारी बड़ी समस्या यह है कि न केवल ऐसी परियोजनायें बनाने वाले नियोजन में अक्षम हैं, उनमें कई लोग ऐसी भी हैं जो परियोजना के माध्यम से ही अरबों के घोटाले कर पाते हैं, जितनी नई परियोजनायें शुरू हों, उतने ही वारे-न्यारे, फिर किसी को भी पूरा करने की ज़रूरत क्या है। जहाँ तक प्रतिक्रियावादियों की बात है वे अपनी बात पर अड़े रहते हैं, कारण धर्म हो चाहे कुछ और ...
देश और जनता का हित सोचने वाले बेबस क्यों हैं?

Thursday, 21 June, 2012  
Blogger रश्मि प्रभा... said...

सारगर्भित आलेख

Thursday, 21 June, 2012  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

बहुत आक्रोश है आपकी पोस्ट में आज ... और क्यों न हो ... देश का बंटाधार कर रहे हैं ये राजनेता और कुछ लोग मिल के ... खाने के अल्वा इन्हें कुछ नज़र नहीं आता ... कोई भी परियोजना शुरू और बंद तब तक माहि करते जब तक उसमें अपने फायदे का कुछ नज़र न आए ...
आजकल पर्यावरण मंत्रालय इसकी सुरक्षा नहीं बल्कि इसलिए बना है की इसमें सबसे ज्यादा फायदा नज़र आ रहा है आने वाले समय में ..

Thursday, 21 June, 2012  
Blogger डॉ टी एस दराल said...

आपकी बातों से सहमति रखता हूँ .
पर्यावरण और देश की सम्पदा --दोनों की सुरक्षा ज़रूरी है .
बढ़िया आलेख .

Thursday, 21 June, 2012  
Blogger पी.एस .भाकुनी said...

जो भी हो! अनियोजित एवं अनियंत्रित विकास कार्यों का खामियाजा एक-न -एक दिन उत्तराखंड को भुगतना ही होगा,
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पी.एस.भाकुनी
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Thursday, 21 June, 2012  
Blogger आचार्य ललित मुनि said...

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Friday, 22 June, 2012  
Blogger संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

पहले परियोजना शुरू कर देते हैं और बाद में बीच में रोक देते हैं ... बिना विचार किए ही सारे काम चल रहे हैं ... सार्थक लेख

Friday, 22 June, 2012  

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