Tuesday, June 5, 2012

उत्तराखंड में पैर पसारते वाइज !

जहाँ तक जातिगत वैमनस्यता का सवाल है उत्तराखंड, जिसे देवभूमि के नाम से भी अलंकारित किया जाता है, में कुछ चुनिन्दा अवसरों, खासकर चुनावी मौसम में सीमित स्तरों पर ही इसके दर्शन होते दिखाई देते है। मगर आजादी के बाद से इस राज्य का पर्वतीय इलाका मैदानी क्षेत्रो से जुड़े चंद कस्बों में हुए छिट-पुट साम्प्रदायिक दंगों के कुछ अपवादों को छोड़, अब तक अमूमन धार्मिक विद्वेष से अछूता ही रहा है। और उसकी जो दो प्रमुख वजहें रही है, उनमे से पहली है, वहाँ के लोगो का सौहार्दपूर्ण और मित्रतापूर्ण व्यवहार और दूसरी वजह यह है कि यूं तो अल्पसंख्यक इस राज्य के पूरे इलाकों में बिखरे पड़े है किन्तु अगर राज्य बनने के बाद जुड़े मैदानी क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो पूरे पहाडी क्षेत्र में अल्पसंख्यकों की आबादी का , वहाँ की कुल आबादी के मात्र दो से पांच प्रतिशत तक होना। ये बात और है कि अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से मुसलमानों की कुल आवादी का प्रतिशत यहाँ बढ़ गया है। आज नैनीताल, उधमसिंह नगर, हरिद्वार और देहरादून जिलों में मुसलमानों की प्रभावशाली उपस्थिति है। राज्य के उधमसिंह नगर जिले में 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है तो हरिद्वार में 37 प्रतिशत। नैनीताल में 15 प्रतिशत और देहरादून में दस प्रतिशत मुसलमान हैं। राज्य की सत्तर में से दस सीटों पर मुसलमान निर्णायक भूमिका निभाता है। उधमसिंह नगर के सितारगंज, किच्छा, जसपुर, नैनीताल के कालाढूंगी, हल्द्वानी, हरिद्वार के बाहदराबाद, मंगलौर, पीरान कलियर, लालढांग, देहरादून के सहसपुर सीटों पर मुस्लिम मत निर्णायक स्थिति में हैं। इस तरह आज इस राज्य की कुल आबादी का करीब १५ % मुस्लिम और २ प्रतिशत सिख तथा ईसाई तथा अन्य धर्मों से सम्बंधित आबादी है, बाकी की करीब ८३ प्रतिशत आबादी हिन्दू आबादी है।



इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत सदियों से एक विविधताओं वाला देश है और अनेको धर्मों के लोग लम्बे समय से इस देश में सहिष्णुता और सहस्तित्व के सौहार्दपूर्ण वातावरण में जीवन यापन करते आए है, लेकिन अब लगता है कि उत्तराखंड में भी शनै:- शनै: धार्मिक अलगाववाद और विद्वेष के बीज तेजी से बोये जा रहे है। और इन बीजों को एक सोची समझी विश्वव्यापी रणनीति के तहत बोने का काम कर रहे है, धर्म-गुरु (वाइज )। कुछ समय से जम्मू और कश्मीर, जो कि एक मुस्लिम बहूल क्षेत्र है, वहां से भी खबरे आ रही थी कि कुछ क्रिश्चियन मिशनरियां वहाँ पर लालच देकर धर्म परिवर्तन करवा रही है। और अभी हाल में इनकी करतूतों का भंडाफोड़ तब हुआ जब गत माह के तीसरे सप्ताह में हिमांचल से लगे उत्तराखंड के पुरोला के मोरी प्रखंड के कलीच गांव में धर्मांतरण को लेकर दो समुदायों के बीच हुआ विवाद मारपीट तक जा पहुंचा। विस्तृत खबर यहाँ देखिये


घटना की सूचना लगते ही गांव पहुंची राजस्व पुलिस ने मामला शांत कराया। बंगाण क्षेत्र के कलीच गांव में बीते चार सालों से धर्म परिवर्तन के मामले सामने आ रहे थे और ये धर्म-गुरु वहाँ की जनजातीय आवादी के एक बड़े हिस्से को अपने झांसे में लेकर धर्मपरिवर्तन करा चुकी है। कलीच गांव के प्रधान जगमोहन सिंह रावत सहित दर्जनों ग्रामीणों ने हिमाचल प्रदेश से आए धर्म प्रचारकों द्वारा प्रलोभन देकर ग्रामीणों को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किए जाने तथा धर्मांतरण कर चुके करीब डेढ़ दर्जन परिवारों द्वारा गांव में माहौल खराब करने का आरोप लगाते हुए डीएम को प्रेषित ज्ञापन में ग्राम प्रधान जगमोहन रावत, सामाजिक कार्यकर्ता प्रभुलाल, चैन सिंह, अशोक चौहान, सूरदास आदि ने आरोप लगाया कि बाहर से आ रहे धर्म प्रचारक तथा धर्मांतरण कर ईसाई बन चुके परिवार गांव के अन्य लोगों को भी सालाना 50 से 80 हजार रुपये देने का प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन के लिए फुसला रहे हैं। विरोध करने पर वे मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। ऐसे में गांव का माहौल खराब हो रहा है।

ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक बड़ा नेटवर्क है जो आदिवासी और जनजातीय इलाकों को अपना निशाना बनाकर कमजोर वर्ग के लोगो को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन करवा रहे है। हालांकि हाल की घटनाओं और आरोपों के सम्बन्ध में अभी जांच चल रही है, लेकिन ऐसा नहीं कि इन बातों में ख़ास सच्चाई न हो।

जिस तरह आज पहाड़ का मूल निवासी रोजी रोटी के लिए तेजी से मैदानों की तरफ पलायन कर रहा है, और बाहर से आये ये वाइज तथा बाहर का कामगार और व्यवसाई वर्ग इस क्षेत्र में अपनी पैठ बना रहे हैं, ऐसा न हो कि आने वाले वक्त में वहाँ बचे-खुचे हिन्दुओं की स्थिति भी एक दिन कश्मीरी पंडितों जैसी हो जाए और चार-धाम जाने के लिए यात्रियों को कश्मीर में बर्फानी बाबा के दर्शनार्थ जाने वाले यात्रा-सुरक्षा तामझाम वाले अंदाज में इन तीर्थ-स्थलों के रास्तों पर से होकर गुजरना पड़े। आज जरुरत हमें इस बारे में सोचने और सजग रहने की हैं।

7 comments:

  1. ग़रीब आदिवासी और जनजातीय लोगों के धर्म कोई वि‍शेष महत्‍व यूं भी नहीं रखता इसलि‍ए आथिर्‍क कारणों से बहुत आसान है उनका धर्मांतरण

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  2. सब जानते हैं कि जनसंख्या सरकारें बनाती हैं, सत्ता का संघर्ष धर्म से होकर जा रहा है, इस धर्मनिरपेक्ष देश में।

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  3. भूखे को क्या चाहिए --दो रोटी . उसे धर्म से क्या मतलब ! इसी का नाजायज़ फायदा उठाते हैं ये धर्म के ठेकेदार .

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  4. Ye durbahgy hai Bharat varsh ka ki sadiyon se yaha dharmaantran ho raha hai ... Aaj jab ham swatantr hain tab Bhi aisi baaton pe koi rok nahi lagai jaati ...

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  5. गफलत में हम गाफिल हैं, फ़ायदा उठाने वाले क्यों न उठाएंगे?

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  6. @बाहर से आ रहे धर्म प्रचारक तथा धर्मांतरण कर ईसाई बन चुके परिवार गांव के अन्य लोगों को भी सालाना 50 से 80 हजार रुपये देने का प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन के लिए फुसला रहे हैं। विरोध करने पर वे मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। ऐसे में गांव का माहौल खराब हो रहा है।

    - किसी के पास दो वक़्त की रोटी जुटाने को भी पैसा नहीं है और कोई संगठन धर्म-परिवर्तन की शर्त पर 80,000 रुपये प्रति व्यक्ति बाँटने की स्थिति में है? इतना पैसा कहाँ से आ रहा है? विदेश से काला धन मंगाने का काफ़ी हल्ला होता है, देश में खुलेआम बँट रहे काले धन की ज़ब्ती नहीं होनी चाहिये क्या?

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  7. देश के जिस जिस हिस्से में विधर्मियों की संख्या बढती गयी वे हिस्से अशांत होते चले गये... यह लेख पढ़कर बड़ा दुःख हुआ की अब देवभूमि भी विधर्मियों की कारस्तानी का केंद्र बन गया...

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