Thursday, September 18, 2014

बेवफ़ा


तरुण-युग, वो कालखण्ड,
जज्बातों के समंदर ने   
सुहाने सपने प्रचुर दिए थे, 
मन के आजाद परिंदे ने
दस्तूरों के खुरदुरेपन में कैद 
जिंदगी को कुछ सुर दिए थे।   

और फिर शुरू हुई थी 
अपने लिए इक अदद् सा 
आशियाना ढूढ़ने की जद्दोजहद, 
जमीं पर ज्यूँ कदम बढे 
कहीं कोई तिक्त मिला,
और कभी कोई शहद।

सफर-ऐ-सहरा आखिरकार, 
मुझे अपने लिए एक  
सपनो की मंजिल भाई थी,
पूरे किये कर्ज से फर्ज 
और गृह-प्रवेश पर
               संग-संग मेरे "ईएम आई" थी।            

अब नामुराद बैंक की 
'कुछ देय नहीं ' की पावती ही, 
हाथ अपने रह गई, 
हिसाब क्या चुकता हुआ  
कि  वो नाशुक्र गत माह 
मुझे अलविदा कह गई।   

दरमियाँ उसके और मेरे 
रिश्ता अनुबंधित था,
वक्त का भी यही शोर रहा है, 
शिथिल,शाम की इस ऊहापोह में 
मन को किन्तु अब 
येही ख़्याल झकझोर रहा है।  

हुआ मेरा वो  'आशियाना ',
उसके रहते जिसपर  
हम कभी काबिज न थे,  
मगर, वह यूं चली गई, 
वही बेवफा रही होगी,
हम बेवफ़ा तो हरगिज न थे।    

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10 Comments:

Blogger सु-मन (Suman Kapoor) said...

बहुत बढ़िया

Thursday, 18 September, 2014  
Blogger Rohitas Ghorela said...

एक अच्छा घर बनाने की जद्दोजहद में बहुत कुछ खोना पड़ता है
भावपूर्ण कविता ...कसी हुई पंक्तियाँ

पासबां-ए-जिन्दगी: हिन्दी

Thursday, 18 September, 2014  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

उम्दा रचना।

Thursday, 18 September, 2014  
Blogger प्रतिभा सक्सेना said...

कुछ लेने की कोशिश में फैले हाथ से , काफ़ी कुछ बिखर जाता है .

Friday, 19 September, 2014  
Blogger डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-09-2014) को "हम बेवफ़ा तो हरगिज न थे" (चर्चा मंच 1742) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Friday, 19 September, 2014  
Blogger Arun sathi said...

ओहो... दिल से ..

Saturday, 20 September, 2014  
Blogger आहुति said...

बेहतरीन और बहुत कुछ लिख दिया आपने..... सार्थक अभिवयक्ति......

Saturday, 20 September, 2014  
Blogger कविता रावत said...

एक अदद आशियाना वो भी बेवफा रही
चिंतनशील रचना

Saturday, 20 September, 2014  
Blogger संजय भास्‍कर said...

सुन्दर भावनात्मक कविता !

Saturday, 20 September, 2014  
Blogger दिगम्बर नासवा said...

इतनी आसानी से कहाँ कुछ मिल पाता है ... वो भी घर ...
दिल के जज्बात खोल दिए आज तो ...

Sunday, 21 September, 2014  

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