Friday, August 8, 2014

नादाँ !

थाम लो उम्मीद का दामन, छूट न जाए,
  रखो अरमाँ सहेजकर, कोई लूट न जाए।   
तुम्हारे ख़्वाबों से भी नाजुक है दिल मेरा,
  हैंडल विद एक्स्ट्रा केयर,कहीं टूट न जाए।

उलटबासी 
शायद ही बचा रह गया हो कोई धाम,
क्या मथुरा, क्या वृंदावन,क्या काशी,
किस-किस से नहीं पूछा पता उसका,
क्या धोबी,क्या डाकिया,क्या खलासी, 
 सबके सब फ़लसफ़े,इक-इककर खफ़े, 
       लिए घुमते रहे बनाकर सूरत रुआँसी,        
उम्र गुजरी,तब जाके ये अहसास हुआ,
जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी। 

6 comments:

  1. उम्र गुजरी,तब जाके ये अहसास हुआ,
    जिंदगी घर में थी, हमने मौत तलाशी।
    ..बहुत बढ़िया ....पहले घर फिर बाहर

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  2. आपका ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगा. अंतरजाल पर हिंदी समृधि के लिए किया जा रहा आपका प्रयास सराहनीय है. कृपया अपने ब्लॉग को “ब्लॉगप्रहरी:एग्रीगेटर व हिंदी सोशल नेटवर्क” से जोड़ कर अधिक से अधिक पाठकों तक पहुचाएं. ब्लॉगप्रहरी भारत का सबसे आधुनिक और सम्पूर्ण ब्लॉग मंच है. ब्लॉगप्रहरी ब्लॉग डायरेक्टरी, माइक्रो ब्लॉग, सोशल नेटवर्क, ब्लॉग रैंकिंग, एग्रीगेटर और ब्लॉग से आमदनी की सुविधाओं के साथ एक सम्पूर्ण मंच प्रदान करता है.
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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (09-08-2014) को "अत्यल्प है यह आयु" (चर्चा मंच 1700) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. बहुत सुंदर ...रक्षाबंधन की शुभकामनायें

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  5. क्या बात सर ... हैंडल विथ एक्स्ट्रा केयर ...
    रक्षाबंधन की बधाई ...

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  6. बेहद उम्दा.. .बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ
    रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनायें...

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